Vote DTF!

एक आत्मीय चिट्ठी कुलपति के नाम
उनके अनुयायियों के विशेष आग्रह पर

महामहिम कुलपति महोदय,

आख़िरकार वह चीज़ सिर पर आ ही गई जिसे चुनाव कहते हैं और जो आपको, कतई वाजिब कारणों से, सख़्त नापसंद है। चुनाव न होते तो ए.सी. और ई.सी. की बैठकों में चुने हुए नुमाइंदे न होते; चुने हुए नुमाइंदे न होते तो आपकी माइंड-ब्लोइंग योजनाओं पर शोर-शराबे न होते; जो चार-पांच असहमतियां दर्ज होती हैं, विरोध में बयान जारी किए जाते हैं, ग़ैर-लोकतांत्रिक रवैये पर स्यापा किया जाता है, वह सब न होता। सोच कर ही रोमांच हो आता है कि तब ‘सुधारों’ की राह कैसी बाधाहीन होती और उस पर सरपट गाड़ी भगाने में कितना मज़ा आता!

पर फ़िलहाल तो यह ख़याली पुलाव है। बार-बार ब्रेक लगाना, गियर बदलना, भोंपू बजाना–ख़ामख़ा की चिल्ल-पों मची हुई है। आपने इतना कुछ किया, तो थोड़ा ‘ज़ोर लगाकर’ चुने हुए नुमाइंदों वाली व्यवस्था को भी ‘हइषा’ कर डालना था ना!

मान्यवर, हम ये बातें न सिर्फ़ दिल से कह रहे हैं, न सिर्फ़ दिमाग़ से और न ही केवल देह यानी कम्प्यूटर पर चलती उंगलियों और बेहोशी में चलती जुबान से। ये तो माइंड, बाॅडी एंड हार्ट के सामंजस्य की पैदावार हैं। जिसने भी इस सामंजस्य को हासिल कर लिया, वह आपकी प्रतिभा का क़ायल हो गया। दरअसल, इन दिनों विश्वविद्यालय आपकी मौलिक प्रतिभा के कीटाणुओं से इस क़दर बजबजा रहा है कि जिसकी मिसाल दिविवि के इतिहास में खोजे नहीं मिलती। कुछ भोले-भाले लोगों का दावा है कि पिछले कुलपति प्रो. दीपक पेंटल इस मामले में आपको कड़ी स्पर्धा देते हैं, पर सच देखिए तो प्रो. पेंटल के कारनामे क्या खाकर आपकी कारगुज़ारियों का मुक़ाबला कर पाएंगे! कोबाल्ट-कबाड़-कारनामा जैसी दो-चार ऐतिहासिक उपलब्धियों को छोड़ दें, तो तीन सत्रों को छह सेमेस्टरों में बांटने और सिलेबस को बीच से काटने के अलावा वे कर ही क्या पाए? क्या वे कभी बादशाह की तरह दरबारे-आम लगा पाए? क्या वे विद्यार्थियों को 100 में से 102 नंबर दिला पाए? क्या उनके कार्यकाल में विद्यार्थियों को कभी दो-दो मार्कशीट्स मिलीं, कि बेटा, जहां जैसी ज़रूरत हो, वहां वैसा इस्तेमाल करो? क्या वे ऐसा ढांचा पारित करा पाए जिसमें बारहवीं पास बच्चों को काॅलेज में दसवीं की चीज़ें पढ़ने को मिलें और ज्ञान का सत्यानाष भले हो, उनके काॅलेज-डेज़ की बल्ले-बल्ले हो जाए? क्या वे तीन एक्ज़िट-प्वांइट्स जैसा कोई तरीक़ा ढूंढ़ पाए जिससे कि अपनी आर्थिक औक़ात के अनुसार ही विद्यार्थी शिक्षा का हक़दार या लाभार्थी बने? जिसकी जैसी औक़ात, उसको उतनी शिक्षा! क्या वे ऐसी महत्वाकांक्षी योजना बना पाए जिससे वर्कलोड हमेशा अस्थिर बना रहे और 4000 ख़ाली पड़े शिक्षक-पदों के काॅन्ट्रैक्चुअलाइज़ेशन की राह हमवार हो? क्या वे ऐसा उपाय कर पाए जिससे स्थायी नियुक्तियों को नामुमकिन बना कर आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था से बचने का राजमार्ग तैयार किया जा सके? क्या वे ‘इमरजेंसी पावर’ जैसी भारी-भरकम चीज़ का सहारा छोड़ कर रजिस्ट्रार की चिट्ठी जैसी हल्की चीज़ को क़ानून का दर्जा दिला पाए? क्या वे कभी हड़ताली शिक्षकों की तनख़्वाह काट पाए? क्या वे कभी यह कह पाए कि डूटा एक ग़ैरक़ानूनी संघ है? क्या वे कभी विश्वविद्यालय के सुरक्षा-गार्डों को चोरी-झपटमारी के काम पर तैनात कर पाए, मसलन, यह हुक्म दे पाए कि डूटा के धरना-स्थल पर रखे कुलपति के पुतले को झपट कर उड़न-छू हो जाना है? क्या वे बिजली की पूरी फ़ेज उड़ा कर ‘द ग्रेट डिक्टेटर’ की पब्लिक-स्क्रीनिंग जैसा राजद्रोह करने पर उतारू माॅन्स्टर-माॅन्स्टरानियों (यानी मास्टर-मास्टरानियों) के होश ठिकाने लगा पाए?

ये सवाल तो बस कुछ संकेत हैं उस प्रवृत्ति के, जिसकी मिसाल निकट अतीत क्या, सुदूर अतीत में भी नहीं मिलती। विश्वविद्यालय के पुराने ढांचे को ‘खोपसहित कबूतरायनमः’ कर देने का ऐसा जोश, पिछड़े हुए लोकतांत्रिक मूल्यों को साहब और मातहत वाली काॅरपोरेट संस्कृति से रिप्लेस कर देने का ऐसा जज़्बा, आलोचनात्मक चिंतन के ढोंग को लतिया कर शिक्षा को बाज़ार की सेवा में बहाल करने की ऐसी प्रतिबद्धता–अतुलनीय है! लिहाज़ा, जो लोग प्रो. पेंटल या ऐसे किसी भी भूतपूर्व के साथ आप सरीखे अभूतपूर्व का तुलनात्मक अध्ययन कर रहे हैं, उनका भोलापन अक्षम्य है। उन्हें आप सज़ा के तौर पर अविलंब एग्ज़ाम-ब्रांच में पदस्थापित कर दें। एग्ज़ाम (यानी काम का बोझ) उन्हें जीने नहीं देगा और ब्रांच (यानी अधिकारी होने का बोध) उन्हें मरने नहीं देगा।ज़िन्दगी नरक हो जाएगी।

पर महामहिम, आपकी मौलिक प्रतिभा के विरोध में जिस तरह की महामुहिम का आग़ाज़ किया जा चुका है, वह चिंताजनक है। विद्यार्थी, शिक्षक और कर्मचारी लामबंद हुए जाते हैं। रामजस काॅलेज से लेकर मिरांडा हाउस और स्कूल ऑफ़ ओपन लर्निंग तक में विद्यार्थियों के प्रतिरोध के नज़ारे देखने को मिल रहे हैं। लगता है, तरेपन दिनों की रिले हंगर-स्ट्राइक ने अंदर-अंदर लावे को अच्छी तरह खौला दिया है, जबकि हम ख़ामख़ा खुश हुए जा रहे थे कि भुक्खड़-ताल यानी भूख-हड़ताल पर बैठे माॅन्स्टर-माॅन्स्टरानियों की कोई सुनवाई न कर हमने लंबा तीर मार लिया है। जनाब, यह लामबंदी जब डूटा की जनसुनवाइयों और संसद तक मार्च के कार्यक्रम में अपना रंग दिखाएगी, तब के बारे में अभी से कुछ तजवीज़ कर रखना ज़रूरी है। अंकल सैम से लेकर सैम पित्रोदा तक, हर किसी का दरवाज़ा खटखटाने की ज़रूरत है, मेरे आका! वर्ना 2014 के आम चुनावों के माहौल का फ़ायदा उठा कर ये रणनीतिकार, हो सकता है, संसद-मार्च जैसी कारस्तानियों के बल पर आपको पटखनी दे दें और कामयाबी के मुक़ाम तक पहुंचते-पहुंचते आपके तमाम लोककल्याणकारी शड्यंत्रों की हवा निकल जाए। मंदी के पूरे दौर में ‘बबल-बर्स्ट’ या बुलबुले के फूटने की इतनी चर्चा सुनी है कि न चाहते हुए भी वही याद आता है। वैसे कहते तो ये भी हैं पश्चिम में जब ये बुलबुले फूटने शुरू हुए, तभी मंदी से पार पाने के लिए भारत जैसे मुल्कों को शिक्षा का बाज़ार बनाने की वह योजना अमरीकी स्वामियों के जेहन में आई जिसे अमल में लाने की कोशिश आप जैसे लोग कर रहे हैं। पर ऐसा कहनेवालों के क्या मुंह लगना! हम कोई सोए हुए थोड़े ही हैं कि जग जाएं! हम तो जगे हुए लोग हैं और जगे हुओं को भी कोई जगा पाया है!

ख़ैरियत है कि पिछले दिनों आपकी मौलिक प्रतिभा के कीटाणुओं को अधिकारी-वर्ग का ही नहीं, कुछ शिक्षक-ग्रुपों का भी समर्थन हासिल हो गया। श्री आदित्य नारायण मिश्र के नेतृत्ववाली ए.ए.डी. ने तो खुल कर आपके अभियानों का पक्ष लेना शुरू कर दिया है। हां, ये है कि जब शिक्षक असुविधाजनक सवाल करने लगते हैं तो उन्हें बग़लें झांकना पड़ता है, पर आपसे उन्हें जितना कुछ हासिल हो रहा है, उसके लिए थोड़ा बग़लें झांकने में कौन-सा पहाड़ टूट पड़ता है! दूसरे कई समूह भी आपकी योजनाओं के खिलाफ़ न तो ए.सी. में कोई असहमति दर्ज कराते हैं, न डूटा में उन पर नतीजाख़ेज बहसें होने देते हैं। ये सब, निस्संदेह, जगे हुए लोग हैं जिन्हें कोई जगा नहीं सकता। इन सभी समूहों के सारे नुमाइंदे दोनों निकायों में जीत कर आ जाएं, यह आपकी सेहत के लिए बेहद ज़रूरी होगा। अब जबकि निर्वाचित प्रतिनिधियों वाली व्यवस्था को आप ठिकाने नहीं ही लगा पाए हैं, तो कम-से-कम उस व्यवस्था के भीतर ही इंतज़ाम पुख़्ता रहे!

लेकिन इन समर्थकों पर पूरा भरोसा करना मुष्किल है, महामहिम! शिक्षक, विद्यार्थी और कर्मचारी की लामबंदी जब मुकम्मल होगी और आंदोलन तीखे दौर में पहुंचेगा, तब आपके ये समर्थक एक बार फिर उन्हीं के पाले में दिखलाई पड़ेंगे, इसमें कोई शक नहीं; क्योंकि जिस जनाधार के बल पर राजनीति चलती है, उसकी अनदेखी करके आपका समर्थन करना (डाॅन को पकड़ने की तरह) मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन होगा। यानी कल को, संभव है, ए.सी. में चार-पांच असहमतियों की जगह एकमुश्त छब्बीस असहमतियां दर्ज हों और आपकी भद् पिट जाए। पर फ़िलहाल तो ऐसा लगता है कि आपके समर्थक समूहों के तमाम उम्मीदवार ए.सी. और ई.सी. जीत जाएं तो फ़ौरी तौर पर राहत मिल पाएगी।

हां, यह राहत तब तक बेमानी होगी, जब तक डी.टी.एफ़ वालों को इस दायरे से हंकाल कर पूरी तरह बाहर न कर दिया जाए। ये आपके खिलाफ़ छेड़ी गई महामुहिम के मुख्य शड्यंत्रकारी हैं, जनाब! आपसे गुज़ारिश है कि वो जो आग उगलनेवाली आभा देव हबीब है, उसे ई.सी. में और उसके पैनल के चार और उम्मीदवारों को ए.सी. में घुसने से रोकने के लिए अपने पूरे तंत्र को झोंक दें। इन लड़ाकों के अंदर आने से हर तरफ़ यह संदेष जाएगा कि शिक्षक बड़े पैमाने पर आपके खिलाफ़ हैं और उन लोगों के साथ हैं जो नाहक आपकी राजशाही को टक्कर देने का बीड़ा उठाए हुए है।

किंतु मान्यवर, डर है कि ऐसा ही होने जा रहा है और इस विश्वविद्यालय के नामुराद शिक्षक, जिनके माइंड, बाॅडी एंड हार्ट में कोई तालमेल नहीं रह गया है, निम्नांकित पूरे पैनल को भारी मतों से जिताने जा रहे हैं। कृपया ग्रह-नक्षत्रों के तालमेल का अध्ययन करवा कर देखें कि अभी भी कुछ किया जा सकता है या नहीं। तब तक हम दुआ करते हैं कि ऊपरवाला अगर कहीं है, तो वह आपको इन लड़ाकों से महफूज़ रखे।

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