(Un)Academic Congress on 6 & 7 September

(Un)Academic Congress on 6 & 7 September

In complete disregard of academic norms, statutory procedures and democratic practices, the VC is busy creating new and closed bodies of handpicked participants to manipulate and push his agenda of “reforms”. The “Academic Congress” being organised on 6 & 7 September is aimed at bypassing all possible “obstacles” to the “reforms”. It is also the first time that on important academic issues, the corporate sector and NGOs are being labelled as “stakeholders” and are being invited to participate. These “reforms” are part of the plan to facilitate entry of foreign and private universities to sell higher education for the highest profits. This is the aim of the six Bills on Higher Education pending before Parliament. While these Bills have so far not been passed because of opposition both inside and outside Parliament, the Vice-Chancellor is using unscrupulous and fraudulent means to implement the “reforms” in Delhi University.

So-called “innovative practices”: for whose benefit?

The announcement of the “Academic Congress” claims that it will address the needs of young people by devising “innovative practices” to meet “the challenges of Education in the 21st Century”. Such “innovative practices” already pushed through by the VC are the 4-year undergraduate programme, the Meta College and Meta University. What will students get from these? The 4-year undergraduate programme has multiple exit points: only the few who complete 4 years will get an honours degree while most students will be forced to leave after the second and third years with a diploma or degree of lesser value. Students of the Meta College will only be allowed to do two semesters in one college. For the remaining semesters they will be forced to go to other colleges. Students in the Meta University may have to move between universities even within one semester. Who will be the real beneficiaries of these “innovative practices”? Foreign and private universities who see in these “reforms” their entry into the large higher education “market” in India. Who will pay the price for these “innovative practices”? The young people of this country.

Unprecedented assault on democratic rights

In order to push his agenda, the VC is systematically ignoring the real grievances of students, teachers and karamcharis. Overcrowded classrooms and labs, shortage of classrooms, underequipped labs, inadequate study materials, no time for sports or other activities, 4000 teaching posts not yet to be filled on a regular basis with teachers appointed in one semester and unemployed in the next, 5000 non-teaching posts with contractual staff, non-fulfilment of reservation in admissions and teaching posts: the VC does not want to resolve these and other genuine grievances. He therefore refuses to meet the elected bodies of students, teachers and karamcharis. And when they feel compelled to call for protest, as seen in the recent actions by the DUTA and the DUCKU, the University declares these protests illegal and takes unprecedented forms of punitive action against the participants. The Delhi University has never witnessed such an all-out assault on the democratic rights of all sections of the university community. The most recent measure is the ban imposed on demonstrations and rallies “till further notice”. The pretext announced was the molestation of a girl student during a rally. Instead of taking effective action against the culprits, the University has cynically misused the incident to ban all collective protests. We must fight back and defeat the sinister agenda of destroying this University.

PROTEST AGAINST “ACADEMIC CONGRESS”!

JOIN DHARNA ON THURSDAY, 6 SEPTEMBER!

Assemble at 1 pm at Arts Faculty Gate



AIDSO | AISA | AISF | DTF | JSM KYS
LDTF | MSAD | SAMBHAVANA | SFI | YFSJ
 


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एकेडमिक कांग्रेस 6-7 सितम्बर 2012 का बहिष्कार करें

पिछले कुछ सालों से लगातार बिना किसी चर्चा बहस और जनवादी तौर-तरीकों के सरकार और विश्विद्यालय प्रशासन शिक्षा सुधार लागू करने पर आमादा हैं। इसी कड़ी में 6-7 सितम्बर को दिल्ली विश्वविद्यालय में एक एकेडमिक कांग्रेस आयोजित की जा रही है। इस कांग्रेस में कॉरपोरेट घराने एवं ग़ैर-सरकारी संस्थानो (एनजीओ) को भी आमंत्रित किया गया है। अब पहला सवाल यह उठता है कि क्या वास्तव में इस कांग्रेस में जनवादी प्रक्रिया को लागू किया जा रहा है? यदि हम जनवादी प्रक्रिया की बात करें तो दिल्ली विश्वविद्यालय कुलपति ने पहले ही ‘‘चतुर्वर्षीय स्नातक’’ तथा ‘‘मेटा कॉलेज एवं यूनिवर्सिटी’’ की घोषणा कर दी है। इतना ही नहीं कांग्रेस में सभी तबके के छात्रों एवं शिक्षकों को आमंत्रित नहीं किया गया बल्कि किसी भी मतभिन्नता की कोई गुंजाइश न रहे इसका पूरा प्रबंध् इसके प्रक्रिया के तहत किया गया है। इससे साफ़ हो जाता है कि यह जनवाद का मुखौटा मात्र है और नीतियों को लागू करने का फैसला पहले ही लिया जा चुका है। दूसरा सवाल यह उठता है कि किस आधार पर ‘‘कॉरपोरेट घरानों’’ और ‘‘ग़ैर सरकारी संस्थाओं’’ (एनजीओ) को स्टेकहोल्डर की श्रेणी में रखा जा रहा है? आखिर इनका शिक्षा से संबंध ही क्या है? यदि कोई भी कॉरपोरेट या एनजीओ शिक्षा में निवेश करती है तो इसका सीध-सादा मकसद मूलतः मुनापफा कमाना एवं तमाम शिक्षा-व्यवस्था को पूँजी के हित में ढालना ही होगा।
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सुधारों के नाम पर उठाए गए कदम किसके हित में?

डब्ल्यू टी ओ की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में शिक्षा क्षेत्रा में कई लाख करोड़ रूपए का बाजार मौजूद है। यह सर्वविदित है कि पूँजीवाद-साम्राज्यवाद अपने चरम संकट के दौर से गुजर रहा है। जहाँ एक तरपफ बड़े-बड़े कॉरपोरेट घरानों के तमाम तरह के उत्पादनों के मुनाफे में भारी कमी आ रही है। वहीं दूसरी तरफ शिक्षा उन्हें अकूत मुनाफे के क्षेत्र के रूप में दिखाई दे रहा है। शिक्षा में निजीकरण और व्यापारीकरण को लाकर शिक्षा क्षेत्र को एक उद्योग में तब्दील करने के लिए अनुदान और पीपीपी (पब्लिक-प्राईवेट-पार्टनरशिप) के नाम पर सरकार कॉरपोरेट घरानों को मुनाफ़ाखोरी की खुली छूट दे रही है। दरअसल इसी मकसद से संसद में 6 शिक्षा बिलों को पेश किया गया है। हालांकि देशभर में चल रहे शिक्षा आंदोलन के दबाव के कारण इन बिलों को अभी तक पास नहीं किया जा सका है लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन बहुत ही बेशर्मी से छात्र, शिक्षकों एवं कर्मचारियों के मतों को खारिज करते हुए इन शिक्षा विरोधी नीतियों को लागू करने पर आमादा है।

विश्वविद्यालय में तथाकथित ‘सुधारों’ के नाम पर ऐसे कुछ परिवर्तन लाए जा रहे हैं जिससे छात्रों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण जन्म न ले सके एवं मानवीय मूल्यबोध भी सृष्टि न हो सकें। आज एक तरफ़ दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र, शिक्षक एवं कर्मचारी कक्षाओं की कमी, प्रयोगशालाओं में पर्याप्त सामग्री का अभाव, पुस्तकालयों में उपयुक्त संख्या में नए संस्करण के किताओं की कमी, 4000 शिक्षकों के पद पर अस्थायी नियुक्ति व 5000 गैर-शैक्षणिक पदों पर ठेके पर बहाली जैसी समस्याओं से रूबरू है वहीं सेमेस्टर प्रणाली, इण्टर-डिसिप्लीनरी कोर्स, कोर्स क्रेडिट प्रणाली आदि को लागू करके आज शिक्षा-व्यवस्था को किताबी ज्ञान तक ही सीमित कर दिया गया हैं। परिणामस्वरूप आज छात्रों में अधिकतम अंक लाने की होड़ के सिवा और कोई लक्ष्य नहीं रह गया है। किसी भी विषय पर विस्तृत चर्चा-बहस और उसके बुनियादी विषय-वस्तु को ना समझने की मानसिकता आज आम बात है। चरित्र निर्माण के शिक्षा के मूल उद्देश्य को निजीकरण-व्यापारीकरण ने पूरी तरह से नष्ट कर दिया है। यही नहीं बल्कि प्रशासन के इन सारे फ़ैसलों का असल मकसद शिक्षा को बाजार अर्थव्यवस्था के हिसाब से ढ़ालना है जिसका कि फ़ायदा निजी पूंजी निवेशकों को सीधे तौर पर मिल सके।
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जनवादी अधिकारों पर अभूतपूर्व हमला

विश्वविद्यालय प्रशासन इन समस्याओं का सही में समाधान चाहती नहीं। इसीलिए शिक्षा में जनवादी पहलू को नष्ट करने के उद्देश्य से कॉलेज-विश्वविद्यालय में होने वाले छात्रसंघ के चुनावों पर तरह-तरह के प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं। इतना ही नहीं देश भर में होने वाले छात्र-शिक्षक आन्दोलनों को दबाने के लिए तरह-तरह के नियम-कानून थोपे जा रहे हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय नए-नए प्रावधान लाकर छात्रों से उनके न्यूनतम जनवादी अधिकार भी छीने जा रहे हैं। हाल ही में दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षकों की एक भूख हड़ताल को दिल्ली विश्वविद्यालय ने अवैध और अनैतिक करार देते हुए इस हड़ताल में शामिल होने वाले अध्यापकों पर अनुशासनात्मक कार्यवाही की। इसी तरह कैम्पस में पर्चे बाँटना, सभा का आयोजन एवं जुलूस निकालने पर प्रतिबंध, यहाँ तक कि आज़ादी आन्दोलन के मनीषियों एवं क्रान्तिकारियों के दिवस मनाने पर भी भारी आपत्ति जताई जाती है। प्रशासन पूरी तरह से आन्दोलनों पर प्रतिबंध लगाकर शिक्षा-विरोधी नीतियों को मनमाने तरीके से लागू करने के प्रयास में जुटा हुआ है। हाल ही में एक रैली में छात्राओं के साथ हुई छेड़छाड़ की घटना के बहाने विश्वविद्यालय प्रशासन ने किसी भी प्रकार के प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगा दिया है। इस घटना के दोषी व्यक्तियों को अविलम्ब पकड़कर उन्हें उपयुक्त सजा देने के बजाए प्रशासन के द्वारा इस बहाने प्रतिवाद के स्वर को दबाने का भरपूर प्रयास किया जा रहा है। हम सभी छात्रों, शिक्षक एवं कर्मचारियों से इस शिक्षा-विरोधी एकेडमिक कांग्रेस का पुरजोर विरोध करने की अपील करते हैं।
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एकेडमिक कांग्रेस के खिलापफ धरना

6 सितम्बर 2012

दोपहर 1 बजे आर्ट्स फ़ैकल्टी के गेट पर इकट्ठा हों 


AIDSO | AISA | AISF | DTF | JSM KYS
LDTF | MSAD | SAMBHAVANA | SFI | YFSJ
 


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