Newsletter, August 2008

गणित का पाठ्यक्रम

सदन में, ‘वाह वाह’; पब्लिक में, ‘हाय हाय’

जब नुमांइदे हों ऐसे, जाएँ तो कहाँ जाएँ

आख़िरकार गणित का कुख्यात पाठ्यक्रम पूरे विश्वविद्यालय  के गणितज्ञों की आलोचना और आक्रोश को रौंदता हुआ ऐकेडमिक काउंसिल में पास हो गया, सिर्फ़ डी.टी.एफ़. से जुड़े नुमांइदों के ÷नोट ऑफ़ डिस्सेंट’ के साथ। पास होने की दास्तान दिलचस्प, हैरतनाक और साथ ही शिक्षाप्रद है, लेकिन उस पर हम थोड़ी देर बाद आएंगे। पहले चर्चा इस बात की कि आख़िर पाठ्यक्रम-विवाद का मसला है क्या ?

बात शुरू हुई अक्तूबर, 2007 में जब एक नये पाठ्यक्रम के विचार-विमर्श में लगे गणित के शिक्षक-शिक्षिकाओं को पता चला कि उनकी सारी मेहनत बेमानी है, क्योंकि कुलपति ने अपने स्तर पर पाठ्यक्रम के बदलाव के लिए एक विशेषाधिकार समिति (एम्पावर्ड कमिटि) गठित कर दी है। यह समिति दक्षिण परिसर के डायरेक्टर प्रो. दिनेश  सिंह की अध्यक्षता में गठित की गई थी। चूँकि समिति विशेषाधिकार संपन्न थी, इसलिए वाजिब ही था कि वह आम अध्यापक के अधिकार की परवाह न करे ! सो उसने नहीं की। मुट्ठी भर लोगों ने पाठ्यक्रम के ढाँचे से लेकर उसकी अंतर्वस्तु (कॉन्टेंट) तक, सब कुछ को बदल डाला। बी.ए. (गणित) ऑनर्स तथा बी.एससी. (गणित) ऑनर्स को मिला कर उसने एक कर दिया और सिलेबस के स्तर पर ऐसे बदलाव किए, जिसे देखने के बाद पूरे विश्वविद्यालय के प्राध्यापक ख़ासे विचलित हो गए। लेकिन वे कर ही क्या सकते थे ? उन्हें किसी भी स्तर पर निर्णय-प्रक्रिया में भागीदार बनाना विशेषाधिकारियों को गवारा न था। कॉलेजों में पढ़ानेवाले इन आम प्राध्यापकों को नये ढाँचे और सिलेबस की एक झलक दिखला कर इस साल अप्रैल महीने में समिति ने एक संयुक्त आम सभा बुला ली। इसमें उन्होंने ‘कमिटि ऑफ़ कोर्सेज’ और फ़ैकल्टी कमिटि को भी आमंत्रित कर लिया। इसका कारण यह था कि विशेषाधिकार समिति ढाँचागत बदलाव का काम ही कर सकती है, वह सिलेबस में बदलाव करनेवाली ‘कमिटि ऑफ़ कोर्सेज’ के अधिकार और कर्तव्यों को अपने हाथ में नहीं ले सकती। लिहाजा विशेषाधिकारियों ने यह तय पाया होगा कि औपचारिकता के लिए एक बैठक कर इन सबको लाइन हाजिर किया जाए और काग़ज पर दस्तख़त ले लिए जाएँ। अपनी ओर से बयान लिख कर उस पर गवाह के दस्तख़त ले लेने वाला यह पुलिसिया मिजाज़ उक्त बैठक में हावी रहा, जैसा कि बैठक में शामिल कई शिक्षक-शिक्षिकाओं का कहना है। ‘कोर्स कॉन्टेंट’ को लेकर जो लोग मुत्मइन नहीं थे, उन्हें या तो डपट कर चुप करा दिया गया, या फिर उनके सवाल की जड़ों में उपेक्षा का मट्ठा डाल दिया गया।

तभी से गणित के शिक्षक इस पाठ्यक्रम को लागू किए जाने के ख़िलाफ़ अपनी मुहिम चला रहे थे। उनकी माँग बस इतनी थी कि अमल में लाने से पहले इस पर बहुसंख्यक शिक्षकों की राय ले ली जाए। जैसा कि होना ही था, उनकी यह माँग मानी नहीं गई और नये पाठ्यक्रम को ऐकेडमिक काउंसिल की 12 जुलाई की बैठक के एजेंडे में शामिल कर दिया गया। 10 जुलाई को हुई ‘स्टैंडिंग कमिटि फ़ॉर ऐकेडमिक अफ़ेयर्स’ की बैठक में यह पाठ्यक्रम अनुमोदन के लिए आया। उसमें डी.टी.एफ़. से जुड़े शिक्षक प्रतिनिधि राजीब रे ने बदलाव की पूरी प्रक्रिया पर कई सवाल खड़े किए, जिनका कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिला। अंततः राजीब रे की असहमति को दर्ज करते हुए नये पाठ्यक्रम को अनुमोदन दे दिया गया।

स्टैंडिंग कमिटि की बैठक में जो ट्रेलर दिखलाया गया था, उससे यह जाहिर हो गया था कि ऐकेडमिक काउंसिल में क्या होने जा रहा है। 12 जुलाई को काउंसिल की बैठक में गणित के विभागाध्यक्ष ने बदलाव की पूरी प्रक्रिया को लेकर अपनी गहरी पीड़ा व्यक्त की, डी.टी.एफ़. से जुड़े सदस्यों ने बहुत तीखे तर्कों के साथ नियम-क़ायदों को ताख पर रखे जाने की आलोचना की, लेकिन प्रश्स्तिगान करनेवालों की बड़ी तादाद के आगे ये आलोचक अल्पसंख्यक होकर रह गए। जो ए.ए.डी. कॉलेज शिक्षकों के बीच लगातार इस बदलाव के विरोध में जुबानी जमाखर्च करती रही, उससे जुड़े नुमांइदों ने ए.सी. के बंद सदन के भीतर इस बदलाव की महत्ता और महानता का गुणगान किया। एक ने तो यहाँ तक कह डाला कि उन्हें फ़ोन पर किसी ने कहा कि अगर वे पाठ्यक्रम का समर्थन करेंगे तो उन्हें चुनाव में गणित के शिक्षक-शिक्षिकाओं की नाराजगी झेलनी पड़ेगी और जवाब में उन्होंने फ़ोन पर कहा कि उनकी जिम्मेदारी आकादमिक गुणवत्ता की रक्षा करना है, वे वोट की परवाह नहीं करते।

एन.डी.टी.एफ़. का मामला भी कुछ जुदा न था। पब्लिक में वह कितने तीखे तेवर के साथ इस बदलाव के ख़िलाफ़ है, बतलाने की जरूरत नहीं। उधर सदन में क्या हुआ? आपने नये कोर्स-कॉन्टेंट के प्रति संतोष व्यक्त किया, प्रक्रिया को लेकर थोड़ी नाराजगी जताई, और अंततः हरी झंडी दिखाते हुए यह जहिर कर दिया कि नाराजगी तो रस्म-अदायगी भर थी।

बहरहाल, जब बहस के बाद कुलपति ने कहा कि हम इस पाठ्यक्रम को 2009 के सत्र से लागू करने के लिए पारित करते हैं, तो पूरे सदन में सिर्फ़ छह लोगों ने बाआवाजेबुलंद इसका विरोध करते हुए अपनी असहमति रिकॉर्ड कराई। इनमें डी.टी.एफ़. से जुड़े पाँच निर्वाचित प्रतिनिधि थे, जिनका साथ ए.सी. के अन्य सदस्यों के बीच से शास्वति  मजुमदार ने दिया। तो ये था पूरा क़िस्सा-कोताह। क्या अब भी यह बतलाने की जरूरत है कि यह दास्तान दिलचस्प होने के साथ-साथ हैरतनाक और शिक्षाप्रद क्यों है ?

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