Newsletter, August 2008

एम.फिल. के दाख़िले: गुणवत्ता के नाम पर शोध पर हमला

कोई तीन हफ्ते पहले की बात है, विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से सभी विभागों को एम.फिल. के दाख़िले से संबंधित एक फ़रमान मिला। यह फ़रमान कहता है कि (1) किसी भी विभाग के एम.फ़िल. कार्यक्रम में अधिकतम 25 शोधार्थियों को दाख़िला मिल सकता है, (2) शोधार्थियों की संख्या विभाग के शिक्षकों की संख्या के दोगुने से ज्यादा नहीं हो सकती, (3) दाख़िले में 15 फ़ीसद अनुसूचित जाति, 7.5 फ़ीसद अनुसूचित जनजाति और 27 फ़ीसद अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षित होंगे, (4) चुने गए शोधार्थियों में से किसी भी तरह की फ़ेलोशिप न पानेवालों के बीच से एक चौथाई को 3000 रुपये प्रतिमाह की फ़ेलोशिप दी जाएगी, और (5) फ़ेलोशिप देने में भी उपर्युक्त तीनों आरक्षण लागू होंगे।

ध्यान देने की बात यह है कि विश्वविद्यालय प्रशासन का यह निर्णय एक पुराने ऑर्डिनेंस को लागू करने के नाम पर हो रहा है। ऐसा तब हो रहा है जब भारत सरकार की ओर से रिसर्च को बढ़ावा देने की जरूरतों पर जोर दिया जा रहा है। इसके साथ ही सरकार की ओर से उच्च शिक्षा में ओबीसी आरक्षण को लागू करने के साथ ही सामान्य श्रेणी के छात्र-छात्राओं की संख्या में कमी न हो इसलिए 54 प्रतिच्चत सीट बढ़ाई जा रही है। इस सब के लिए सरकार की ओर से पैसा भी दिया जा रहा है। आज जब काफी सालों के बाद सरकार की नींद खुली और उच्च शिक्षा में बढ़ोत्तरी की संभावना दिखाई दे रही है, तब विश्वविद्यालय प्रशासन की इस कोशिश  को जहां एम.फिल्‌. की सीटों पर रोक लगायी जाए या कम किया जाए सरासर उच्च शिक्षा विरोधी और खासकर शोध विरोधी नजरिया ही कहा जा सकता है। सवाल यह है कि विश्वविद्यालय प्रशासन की इस सबके पीछे मंशा क्या है ?

उदाहरण के तौर पर : इस निर्णय से जहां सभी विभागों में सीटों की बढ़ोत्तरी की संभावना खत्म होती है, वहीं इसकी मार हिंदी विभाग पर सीधे-सीधे पर रही है। हिंदी विभाग में सरकार के निर्णय के अनुसार जहां 54 प्रतिशत सीटें बढ़ाई जानी चाहिए थी, विश्वविद्यालय प्रशासन ने निर्णय को उलट कर वर्तमान से 45 प्रतिशत सीट कम करने का फैसला किया है। हिंदी विभाग में इस समय दोनों परिसर मिला कर प्रतिवर्ष 45 दाख़िले होते हैं। अगर सिर्फ़ दूसरे नुक्ते को ध्यान में रखें, तो यह संख्या बिल्कुल उचित ठहरती है। विभाग में स्थायी पदों की कुल संख्या 22 है। लेकिन इस सत्र से दाख़िले सिर्फ़ 25 विद्यार्थियों के होंगे, क्योंकि नुक्ता संख्या 2 को नुक्ता संख्या 1 नियंत्रित कर रहा है। जिस विश्वविद्यालय में हज़ारों की तादाद में हिंदी ऑनर्स करनेवाले विद्यार्थी हैं, सैंकड़ों की तादाद में हिंदी से एम.ए. करनेवाले विद्यार्थी हैं, वहां पहले से ही नाकाफ़ी ठहरनेवाली एम.फ़िल. की सीटों को लगभग आधा किया जा रहा है और विश्वविद्यालय के अधिकारियों की मानें, तो यह सब हो रहा है शोध की गुणवत्ता की ख़ातिर। यानी रवैया वही है कि ‘पता नहीं कहां-कहां से चले आते हैं भेड़-बकरियों की तरह !’

कुलपति की इस हरक़त का पुरज़ोर तरीके से विरोध करने की जरूरत है और इसके लिए हम निम्नांकित बातों पर आपकी तवज्जो चाहते हैं :

(1) दिल्ली विश्वविद्यालय हिंदी प्रदेश का सबसे महत्वपूर्ण केंद्रीय विश्वविद्यालय है, जिसके ऊपर यह जिम्मेदारी आयद होती है कि वह हिंदी की राष्ट्रीय और राजकीय स्थिति तथा आज के समय में बाज़ार की दृष्टि से उसके बढ़े हुए महत्व से उपजी मांगों को पूरा करने में अग्रणी भूमिका निभाए। इस जिम्मेदारी का निर्वाह करने की क्षमता भी उसके पास है। ऐसे में सीटें बढ़ाने की बजाय घटाना न सिर्फ़ इस जिम्मेदारी से मुंह चुराना है, बल्कि हिंदी की फलती-फूलती संभावनाओं पर एक कुठाराघात भी है।

(2) यू.जी.सी. और मानव संसाधन विकास मंत्रालय हर क्षेत्र में शोध को बढ़ावा देने की बात लगातार कर रहे हैं और शोध को बढ़ावा देने का मतलब निश्चित रूप से शोधार्थियों की संख्या घटाना नहीं है। प्रो. पेंटल और उनके मंदबुद्धि सलाहकार चुनिंदा लोगों को ही सिखाने-पढ़ाने और आगे बढ़ाने में विश्वास रखते हैं। वे यह मानते हैं कि अगर शोध का स्तर बहुत अच्छा नहीं हो पा रहा, तो इसका कारण हमारे सिखाने-पढ़ाने की ग़लतियों में निहित नहीं है, बल्कि वह इस तथ्य में निहित है कि ऊपर वाले ने जिन्हें इस काम के लिए बनाया ही नहीं, वे इसमें घुसे चले आते हैं। प्रो. पेटल ने ए.सी. के सदन में स्पष्ट रूप से यह बयान दिया है कि बहुत कम लोगों में सचमुच रिसर्चर बनने की पात्रता होती है और इस मामले में किसी तरह के ‘इगैलिटैरियनिज्म’ की बात करना उन्हें गंवारा नहीं है।

माफ़ कीजिएगा प्रो. पेंटल, आज का शिक्षाशास्त्र आपकी ऐसी धारणाओं को कतई बेबुनियाद मानता है। यही नहीं, ग़ौर करें तो आप वही तर्क यहां दुहरा रहे हैं, जो उच्च शिक्षा में आरक्षण के ख़िलाफ़ सैंकड़ों बार दुहराया गया है। यानी आप बुनियादी तौर पर इलिटिस्ट और आरक्षण-विरोधी भी ठहरते हैं, भले ही एक संवैधानिक बाध्यता के तहत आपको उसे लागू करना पड़ा हो !

(4) सीटें घटाने के पीछे पहले यह तर्क दिया गया कि जितने चुने जाएंगे, सभी को फ़ेलोच्चिप भी दी जाएगी। दाख़िलों को रोक कर जब एक कमिटी बिठा दी गई थी, तब यही कहा गया था कि दाख़िले के साथ फ़ेलोच्चिप को नत्थी करने की स्थिति में दाख़िले की पुरानी परिपाटी को बदलना तो होगा ही। लेकिन अब जो पत्र भेजा गया है, वह कहता है कि कोई अन्य फ़ेलोशिप न पानेवालों के बीच से एक चौथाई लोगों को 3000 रुपये मिलेंगे। यानी तीन चौथाई को नहीं मिलेंगे। तब ऐसी क्या आफ़त आ गई थी कि संख्या घटाई ही जाए ? यानी यह सब कुछ संख्या को किसी भी तरह कम करने की एक बहानेबाजी थी, और कुछ नहीं। गुणवत्ता के बारे में ‘इलीटिस्ट’ सोच के च्चिकार लोगों को संख्या घटाने के लिए हर हथकंडा अपनाना मंजूर था।

पीएच.डी. को लेकर भी विश्वविद्यालय प्रशासन का यही रवैया सामने आया था। उनके प्रस्ताव में कॉलेज के शिक्षकों को शोध में कहीं भी योग्य नहीं माना गया था। डी.टी.एफ. सदस्यों के तर्कपूर्ण एवं रचनात्मक हस्तक्षेप से एकेडमिक कांउसिल में प्रस्ताव में सुधार किया गया। अब कॉलेज शिक्षकों को न सिर्फ शोध करवाने बल्कि उन्हें विभिन्न शोध कमेटियों में भी शामिल कर लिया गया है। एम.फिल्‌ के प्रस्ताव को भी एकेडमिक कांउसिल में लाया जाना चाहिए था। लेकिन प्रशासन ने बिना कांउसिल में लाए एम.फिल्‌. संबंधी दिशा-निर्देश जारी कर दिया। हम मांग करते हैं कि इन्हें तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाए और आरक्षण की व्यवस्था के साथ सरकार की नीतियों के अनुरूप सीटों को बढ़ाया जाए।

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