DTF Election Leaflet, 25.1.2015

  1. कुलपति के नाम एक हितैषी की चुनावी चिट्ठी
  2. Issues in AC Meeting on 21.1.2014
  3. Why We Must Resist CBCS


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कुलपति के नाम एक हितैषी की चुनावी चिट्ठी

महामहिम कुलपति महोदय,

कहनेवाले कहते रहें, पर हम ये कतई कतई न मानेंगे कि अब आप हमारी खुली चिट्ठी के हक़दार नहीं रह गए. अरे कैसे नहीं रह गए, भाई! पिछली चिट्ठी जब लिखी थी, तब से अब तक में ऐसा क्या बदल गया? रामज़ादों की कसम, हमारे लिए तो आप बिलकुल वही हैं. शेम टू शेम. आपका कुलपतित्व बदस्तूर क़ायम है. आपकी दबंगई में कोई कमी नहीं आई. मनमाने ढंग से लोग चुन कर कमेटियां बनाने की ठसक ज्यों-की-त्यों है. किन्हीं छुपे दरबारों में भींगी बिल्ली सी सूरत भले ही होती हो, कैंपस में आप अभी भी हाथी पर सवार सिंह हैं. महर्षि भारद्वाज एयरोनोटिक्स लिमिटेड की कसम, मैंने किसी को आपके नाम में सिंह की जगह कुछ और, मसलन बिल्ली या छिपकिल्ली, लगाते नहीं सुना. फिर खुली चिट्ठी पाने की पात्रता में शक की गुंजाइश कहाँ?

पर कुछ लोगों को शक है, हुज़ूर. वे कहते हैं कि हमने पिछले साल डूटा चुनाव के समय जब आपको चिट्ठी लिखी थी, उसके बाद से मंज़र ख़ासा बदल गया है. ऐतिहासिक कामयाबियां हासिल कर मौजूदा शिक्षक संघ ने आपकी नाक में दम कर रखा है. मज़ा देखिये, यही लोग हैं जो कहते थे कि एफ.वाई.यू.पी. वापस लिए जाने से आपकी नाक कट गयी. अरे भाई, जब नाक ही नहीं रही तो डूटा दम किसमें कर रही है? इसका मतलब, या तो नाक नहीं कटी, या फिर नाक में दम करने वाली बात झूठ है!… पर ये सिरफिरे मानते कहाँ हैं! कहते हैं, नाक कटी तो ज़रूर थी, पर आपने गणेश प्लास्टिक सर्जरी सेंटर से दूसरी नाक लगवा ली और अब ये मुए उसी में दम कर रहे हैं. बताइये, प्लास्टिक सर्जरी वाली नाक में भी कभी कोई दम कर पाया है? बस, ऐवईं बोलते रहते हैं जो मुंह में आ जाए.

हमें तो ऐसा लगता है, महामहिम, कि जन-भावनाओं के दबाव में ऊपर के हाकिमों ने आपको एकाध झटके भले दे दिए हों, कुल मिलाकर २0१४ में आपकी दबंगई पर ज़्यादा आंच नहीं आई. और आये भी क्यों? जिसमें सही जगह पर घिघियाने और साष्टांग दण्डवत करने की सलाहियत हो, उसकी दबंगई क्यों न महफ़ूज़ रहे? प्रमोशन और पेंशन के मामले में आपने जो किया, उससे आपकी पुरानी साख बिलाशक वापस क़ायम हो गयी है. आपने कहा नहीं, पर सबने साफ़-साफ़ सुना कि नामुरादो, हमें झटका देते हो? तो लो, ये पलट-झटका! न जवानों को चैन से रहने दूंगा, न सेवानिवृत्त बूढों को. फिर सेलेक्शन कमेटियों के मामले में मनमानी का रिकॉर्ड क़ायम कर आपने अपनी दबंगई पर लगी खरोंचों को बिलकुल साफ़ कर डाला. आरक्षण के मामले में तो आपने कोर्ट में हलफ़नामा ही दे दिया कि साहब, हम स्टेट की हैसियत रखते हैं. जिसका मतलब यह कि अपने दलितों-आदिवासियों के साथ हमें कैसा बर्ताव करना है, यह तय करना हमारे अपने अधिकार-क्षेत्र में आता है. सबने इस स्टैंड के लिए आपकी कितनी लानत-मलामत की, पर लोग यह नहीं समझते कि जब यूनिवर्सिटी के पास भी अपनी कोर्ट है, अपने सुरक्षाकर्मी और बाउंसर्स हैं, और सबसे बड़ी बात कि अपना एक अदद राजा है, तो यह स्टेट कैसे नहीं हुई? बस जेलखाने की ही तो कमी है! सो हम कॉलेजों को ही ऐसा बनाए दे रहे हैं कि वे जेल लगें! एक ही कमी थी, वह भी पूरी हुई जाती है!

खैर, अब लोग नहीं समझते तो न समझें. पर यह बात बहुतों को समझ में आ गयी है कि रोस्टर सिस्टम की ऐसी तैसी फेर कर आपने एक मास्टर-स्ट्रोक खेला है. जो लोग परमानेंट हुए, वे भी परमानन्द को प्राप्त न हो सके. जान बीच में अटकी पड़ी है कि कहीं कोर्ट का फ़ैसला उलटा न पड़ जाए. उनका यह असुरक्षा-बोध आपके लिए ही नहीं, तमाम दूसरे हाकिमों के लिए भी कितना मुफ़ीद है, बताने की ज़रूरत नहीं. साथ ही, यह उन समूहों के लिए भी मुफ़ीद है जिन्होंने शिक्षक राजनीति को दलाली का धंधा बना डाला है. ऐसे समूह न हों तो राजनीति मुकम्मल तौर पर ‘अधिकारों की लड़ाई’ बन जायेगी और आप सरीखे हाकिमों का जीना हराम हो जाएगा. ऐसे एक समूह ने ही एफ़.वाई.यू.पी. की वापसी वाले पूरे घटना-क्रम के दौरान आपका खुल कर साथ दिया था और आपके पक्ष में धरना, प्रदर्शन, नारेबाज़ी, टी..वी. चैनलों पर बहस-मुबाहिसा जैसे सारे पुण्यकर्म किये थे. अब आपका कर्तव्य तो बनता ही है कि इन्हें असुरक्षा-बोध से ग्रस्त फोल्लोवेर्स मुहैया कराएं. वैसे, सुना है, इस साल की पहली जनवरी को भी आपने कर्तव्य-निर्वाह का एक नायाब नमूना पेश किया है. इस मददगार समूह के नववर्ष-मिलन के लिए आपने न सिर्फ़ विश्वविद्यालय का अतिथि-गृह उपलब्ध करवाया बल्कि उस अवसर पर मुख्य अतिथि की भूमिका भी निभायी. खलों का ऐसा परस्पर प्रेम देखकर देवताओं ने ज़रूर आसमान से फूल बरसाए होंगे. यह अलग बात है कि आपके दुश्मनों ने बीच में ही फूलों को लपक लिया हो.

अब आइये रोस्टर वाले इस मास्टर-स्ट्रोक के दूसरे फ़ायदे पर. उधर शिक्षक-संघ और आरक्षण-समर्थक समूहों ने शोर मचाया कि रोस्टर दुरुस्त करके नियुक्तियां शुरू करो और इधर आपको तथा आपके हमदर्द शिक्षक संगठनों को यह कहने का मौक़ा मिल गया कि ये लोग आरक्षण में गड़बड़ी का मुद्दा उठा कर इतने समय बाद शुरू हुई नियुक्ति प्रक्रिया को रोक देना चाहते हैं, लिहाज़ा ये शिक्षक विरोधी हैं.

जनाब, अगर यह चाल पूरी तरह कामयाब हो पाती तो वैदिक गणित की कसम, पूरा मामला ही उलट जाता. पर अफ़सोस, एम.ए.-पीएच.डी. किये हुए इन तदर्थ प्राध्यापकों में बेवकूफों की संख्या अभी भी बहुत कम है. ये समझ जाते हैं कि कौन स्थायी नियुक्तियां चाहता है और कौन नहीं चाहता. इन्हें पता है कि जिनको आप नियुक्ति-प्रक्रिया में बाधक बता रहे हैं, उन्होंने ही इसे चालू कराने की लड़ाइयां लड़ी हैं. इसीलिए आपका मास्टर-स्ट्रोक जितना कामयाब हो सकता था, उतना हो नहीं पाया.

पर कोई बात नहीं, आपके पास अभी पत्ते और भी हैं. देखिये, एक पत्ता तो इस नयी सरकार ने ही मुहैया करा दिया है. चार साल वाला प्रोग्राम वापस लेकर इसने तीन साल के लिए सी.बी.सी.एस. लागू करने का फ़रमान जारी किया है जो अपने चरित्र में हू-ब-हू एफ़.वाई.यू.पी. के तरह है. मज़ा ये कि यह स्कीम वर्क-लोड को अस्थिर बनाने के मामले में भी कतई उन्नीस नहीं है. इस तरह एफ़.वाई.यू.पी. के रोल बैक से होनवाले नुक़सान की पूरी भरपाई हो जायेगी और तदर्थ प्राध्यापकों के रूप में असुरक्षा-बोध से ग्रस्त एक ऐसा विराट समूह विश्वविद्यालय में हमेशा मौजूद रहेगा जो कभी चूं-चपड़ न करे. आपने उचित ही पूरी मुस्तैदी दिखाते हुए इसे लागू करने के लिए टास्क-फ़ोर्स गठित कर दी है और उसमें एक ई.सी. उम्मीदवार को भी शामिल कर लिया है. आपसे ऐसी ही बुद्धिमानी की उम्मीद थी.

महामहिम, सी.बी.सी.एस. के रूप में यह जो सुनहरा मौक़ा हाथ आया है, इसे इस्तेमाल करने में अचूक सावधानी दरकार है, नहीं तो विचार-विमर्श और व्यापक भागीदारी पर ज़ोर देनेवाले फिर सर चढ़के बोलने लगेंगे. बोलने लगे ही हैं. इन्हीं की नैतिक और राजनैतिक विजय है कि २१ जनवरी की ए.सी. बैठक में १४ नोट ऑफ़ डिसेंट दर्ज हुए. और-तो-और, जिस केंद्र सरकार ने २ॉ१५-१६ के सत्र से इस स्कीम को सभी विश्वविद्यालयों में लागू करने का फरमान भेजा था, वही अब इन नोट्स ऑफ़ डिसेंट के दवाब में आप पर गुर्राने लगी है कि यह जल्दबाजी क्यों? यह सब बोल-के-लब-आज़ाद-हैं-तेरे-टाइप लोगों की कारस्तानियों का ही नतीजा है. अब यह पक्का करना होगा कि ए.सी. और ई.सी., दोनों जगह सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने वफ़ादार चुन कर आयें. पिछले दो साल इन निकायों में बैठे जिन प्रतिनिधियों ने बार-बार आपकी बैठकों का स्वाद कड़वा किया और बाहर निकल कर आपकी तानाशाही को सार्वजनिक कर दिया, उन्हें अब चुनाव जीत कर आने से रोकना ही होगा. ये घर में घुस आये भेदिये हैं, ये रास्ते के रोड़े हैं, ये क़बाब में हड्डी हैं, ये सीधा हलक में पहुँच जानेवाली खरी मिर्चें हैं. देखिये ना, इस आभा देव हबीब नाम की मिर्ची ने सुस्वादु भोजन के बीच कितनी हिचकियाँ दिलाई हैं! कभी नोट ऑफ़ डिसेंट दे रही है, कभी विजिटर तक शिकायतें पहुंचा रही है, कभी ई.सी. में चल रही धांधलियों के बारे में लोगों को आगाह कर रही है. तौबा तौबा!

सोचिये, यह दुनिया कितनी हसीन होगी जब ई.सी. में चुन कर आये दोनों प्रतिनिधि ‘अपने’ होंगे, ए.सी. में कोई अड़ंगेबाज़ न होगा, निगाहों की हदों तक सिर्फ़ चापलूसों, दलालों, चारणों और मौनी बाबाओं की क़तारें होंगी और मनमाफि़क गुल खिलाने में कोई अड़चन न रहेगी. विश्वविद्यालय को क्विकर या ओएलएक्स पर डाल देना तब कितना सहज होगा और ग़ैर-लोकतांत्रिक होने के आरोपों से बेदाग़ भी!

कमर कसिये, महानुभाव, और इससे पहले कि वेल में कूद पड़नेवाले ये वेल्ले चुन लिए जाएँ, आप अदृश्य भाव से चुनाव में कूद पडि़ए. डी.टी.एफ़. को हराना होगा, वरना तुमको जाना होगा!

– एक हितैषी


Issues in AC Meeting on 21.1.2014

The AC meeting witnessed an increasing number of dissents (from 6 to 14), especially on the ‘Choice Based Credit System’ (CBCS) and the retrospective implementation of API for promotion. This was the result of the collective pressure from teachers on other groups like AAD, INTEC and NDTF.

  • Implementation of CBCS was listed as a reporting item and passed by the University without allowing any discussion.
  • DTF members dissented on the retrospective implementation of CAS 2010. They argued that the UGC Act and Provisions in the UGC Regulation bar retrospective counting of API scores and referred to the UGC clarification on the issue. However, the VC ignored both. DTF members pointed out that the UGC Regulation also mandates a six months time limit for processing promotion applications. However, this was also not accepted. DTF members argued for counting of total service for promotion. Though this was part of earlier DU promotion schemes, the VC refused to include it.
  • We were successful in including a few pro-teacher amendments in the promotion scheme for teachers in UCMS and VPCI including counting of experience as Senior Resident for placement in GP 6600 & no stipulation of 2 years in AGP 6000.
  • DTF members pointed out that the High Court order on Special Chance had made strong arguments about the right to complete education and questioned how one person (the VC) could change a decision taken by the AC. They argued that DU must ensure that this right is respected. The VC was not in favor. Under pressure of arguments inside and student protests outside, the decision was postponed and a committee constituted to look into the matter.
  • Members demanded that the court case on pension be withdrawn and pensions released as well as providing a one-time option of switching for those teachers not covered, the proper roster be implemented and interviews held in all subjects and not selectively, and parity of Physical Education teachers. Issues of lack of transparency in allotment of quarters, denial of academic/duty leave for attending conferences and undertaking fieldwork under various projects, delay in promotions in departments were raised. The VC was evasive on all such issues.

Why We Must Resist CBCS

The Choice-based Credit System (CBCS) is a cafeteria-approach based system devised to facilitate “seamless student-mobility” between courses and universities. Identical in its course structure to the FYUP (repeat pattern of Foundation, Core and Elective Courses), except the fourth year, it will lead to perpetual fluctuation and instability in workload, particularly in light of the fact that there is no proposal to change the rigid workload norms for creating teaching posts.

The UGC proposal is silent on the real issues ailing higher education, such as lack of infrastructure and recruitment of permanent faculty. It claims that the semester system (on which CBCS is based) is working well, without putting forward any review.

The negative experience of the state universities of Tamil Nadu, where the CBCS was introduced several years ago, is telling. See http://tinyurl.com/khknbjo for report in which issues of lack of infrastructure and faculty are prominent.

Academic restructuring, which started in 2008 with semesterisation of post graduate courses, is being done in bits and pieces. We are shown a piece of a jigsaw puzzle and left to argue about it. But very systematically a new framework is being imposed. For the full picture we need to look at the American system which runs on students loan and on the shoulders of adjunct professors (contractual).

  1. Since students are free to move between universities and earn their credits for degree-requirement from any institution, workload will keep varying. This is aimed at promoting private and foreign universities at the expense of public funded universities.
  2. Standards of examination have suffered dilution after semesterisation. A hurried implementation of the UGC’s proposal of involving examiners from other institutions may lead to further confusion and dilution.
  3. Our experience with FYUP, which had the same choice based system, shows that students preferred DC-II and Applied Courses that were seen as market friendly. CBCS will lead to marginalisation of traditional humanities and science subjects. There is a systematic attempt by the Government to shift the focus of teaching-learning in the universities to skill-based courses. CBCS is a stepping stone in this direction.
  4. The DU administration has again shown no interest in reviewing the experience of semesterisation and FYUP or doing an honest infrastructural audit. No thought has been given to the worsening student-teacher ratio. The second-tranche of additional posts under the OBC Expansion Scheme have not been released and colleges have been pushed to deal with over crowded class rooms and large tutorial groups.
  5. DU teachers and students have not been allowed to settle down or adapt to changing situations since 2008. The never-ending process of restructuring has led to to large-scale confusion, instability of workload and dilution of academic standards.
  6. Semesterisation has marginalised SOL students by creating disparity between regular courses of those offered in SOL. Any further restructuring may widen the gap.

For teachers, it is a case of ‘once bitten, twice shy’. The Govt. was forced to roll back the disastrous FYUP due to immense popular pressure and the continuous agitations by teachers and students. It cannot be allowed to repeat the mistakes committed by the previous Govt. Questions of academic feasibility, quality and equity cannot be ignored in the statutory decisions on restructuring or the Govt.’s policy of reform. Ham-handed restructuring and the push towards commercialisation of higher education must be fought back.

The fact that the MHRD has quickly taken cognisance of protests by teachers and students on yet another hurried restructuring shows us the way ahead. Let the forthcoming elections send a decisive signal to the Government and the DU administration that we are ready for this fight.


Polling on 5 February (Thursday), 10.30 am to 4.30 pm


Elect

B. No.

2

Abha Dev Habib

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Dept of Physics, Miranda House
Tel: 9818383074
Email: abha_dev@yahoo.com

to the EC

and

B. No. 1

 V.S.Dixit

VSDixit

Dept. of Computer Science,
ARSD College
Ph: 9212612688
veersaindixit@rediffmail.com

B. No. 11

 Rudrashish Chakraborty

Rudrashish

Dept. of English,
Kirori Mal College
Tel: 9654123823
rudrachakra@gmail.com

B. No. 7

Sujeet Kumar

Sujeet

Dept. of Hindi,
Delhi College of Arts & Commerce
Ph: 9811323323
sujeetdcac@gmail.com

B. No 32

 Jyoti Sabharwal

Jyoti

Dept. of Germanic & Romance Studies,
Arts Faculty
Ph: 9868724759
jyotisabharwal@gmail.com

to the AC

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