“Reforms” for whom?

“Reforms” for Whom?
VC bent on destroying Delhi University

The VC is in a hurry to introduce all kinds of “reforms”. He has announced them to the media but not discussed them with representatives of teachers or students. Just last year he introduced the semester system without proper discussion, procedures or preparation. Now he has announced a 4-year graduation programme to be implemented from 2013. He has already hurriedly pushed through the concepts of Meta University and Meta College in emergency meetings of the AC and EC on 22 and 23 July 2012. The 4-year graduation is modeled on the US Community Colleges which are at the bottom of accreditation rankings. At the India-US Higher Education Dialogue in Washington in June, Kapil Sibal promised to open 100 Community Colleges by June end! These “reforms” are part of the plan to devalue public funded Higher Education and facilitate entry of foreign and private universities to sell higher education for the highest profits. This is also the aim of the six Bills on Higher Education pending before Parliament.

Why 4-year graduation?
Why Meta University and Meta College?

The VC claims that they will increase choices for students. What is the reality? In the 4-year undergraduate programme with multiple exit points a student will only get an honours degree after 4 years. The mass of students will have to exit after the second and third years with a diploma or degree of lesser value. In the Meta College students may only do two semesters in one college and will be forced to go to other colleges for the remaining semesters. In the Meta University students may have to move between universities even within one semester. How will these “reforms” benefit students? How will reservation be implemented? Why are they being pushed in such a hurry?

What have we got from the “reforms” so far?

We welcomed the OBC expansion which brought in many more students to DU. Though funds were given to appoint more teachers and develop infrastructure for the increased student strength, 4000 teaching posts are yet to be filled on a regular basis and DU has failed to expand infrastructure. Today we have overcrowded classrooms and labs, shortage of classrooms, underequipped labs and many teachers working on a short-term basis who may be teaching in one semester and unemployed in the next.

The VC has no time for these issues, his only interest is in bulldozing “reforms”. The semester system was imposed despite protests by teachers. It has diluted the Honours courses. It leaves no scope for in-depth study. Teachers and students are in a perpetual hurry to cover the syllabi for the exams at the cost of genuine learning. It has left no time for sports, extra-curricular and co-curricular activities. Study material is inadequate, particularly in Hindi and in accessible format for the visually disabled. The double load of examinations has led to breakdowns. Many mistakes were committed in the conduct of exams last semester. The results of most courses could be declared only in August. The marks of the UG semester results declared in January 2012 were arbitrarily inflated to create the illusion that the semester system is working well. However, in several PG courses the failure rate has gone up jeopardizing the career of many. Students are therefore unable to understand any logic when they get high marks and when they get low marks. The fee for revaluation has also been increased and the revaluation system will be withdrawn from next year.

Is this the way to improve quality and increase choices for students? Students come to DU with hopes of a good education that will help them to get a good job. The VC’s “reforms” threaten the quality of education and the hopes of its students. We appeal to students and teachers to fight back.


Assemble at 12 noon at Vivekanand Statue, Arts Faculty


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in Hindi 


सुधारकिनके लिए?

कुलपति यूनिवर्सिटी को तहसनहस करने पर आमादा 

कुलपति क़िस्मक़िस्म के ‘सुधारों’ को लागू करने की हड़बड़ी में हैं। उन्होंने मीडिया के सामने उनकी घोषणा कर दी है, पर शिक्षकों और विद्यार्थियों के नुमाइंदों के साथ उन पर विचारविमर्ष करने को तैयार नहीं हैं। अभी पिछले ही साल बिना समुचित विचारविमर्श, प्रक्रिया और तैयारी को अंजाम दिए, उन्होंने सेमेस्टर प्रणाली लागू कर दी। अब उन्होंने 2013 से चारवर्षीय स्नातक कार्यक्रम लाने की घोषणा की है। बहुत जल्दबाज़ी में जनाब मेटा यूनिवर्सिटी और मेटा कॉलेज की संकल्पना को 22 और 23 जुलाई 2012 की ए.सी. और ई.सी. की बैठकों में बाक़ायदा पारित करा चुके हैं। चारवर्षीय स्नातक अमेरिका के उन कम्युनिटी कॉलेजों की तर्ज पर गढ़ा गया है जो एक्रेडिटेषन की रैंकिंग में सबसे निचली पायदान पर हैं। वाशिंगटन में जून में हुई भारतअमेरिका उच्च शिक्षा वार्ता में कपिल सिब्बल ने जून के अंत तक 100 कम्युनिटी कॉलेज खोलने का वायदा किया! ये ‘सुधार’ सार्वजनिक पैसे से चलनेवाली उच्च शिक्षा को अवमूल्यित करने और मुनाफ़ाख़ोरी के लिए उच्च शिक्षा को बेचने की ख़ातिर विदेशी और निजी विश्वविद्यालयों के आने को प्रोत्साहित करने की योजना का हिस्सा हैं। संसद में लंबित उच्चशिक्षासंबंधी छह विधेयकों का भी यही लक्ष्य है।

चारवर्षीय स्नातक क्यों? मेटा यूनिवर्सिटी और मेटा कॉलेज क्यों?

कुलपति का दावा है कि ये हमारे सामने अधिक विकल्प पेश करेंगे। हक़ीक़त क्या है? अनेक निकास बिंदुओं वाले चारवर्षीय स्नातक कार्यक्रम में विद्यार्थी चार साल के बाद ही ऑनर्स डिग्री हासिल कर पाएंगे। विद्यार्थियों की ख़ासी बड़ी संख्या दो और तीन साल के बाद कमतर मूल्य वाले डिप्लोमा या डिग्री के साथ बाहर हो चुकी होगी। मेटा कॉलेज के तहत विद्यार्थी एक कॉलेज में दो ही सेमेस्टर रह पाएंगे और बाक़ी के सेमेस्टरों के लिए दूसरे कॉलेजों में जाने पर मजबूर होंगे। मेटा यूनिवर्सिटी में विद्यार्थी को एक ही सेमेस्टर के अंतर्गत अलगअलग विश्वविद्यालयों में जाना पड़ सकता है। ये ‘सुधार’ विद्यार्थियों के लिए फ़ायदेमंद कैसे हैं? आरक्षण कैसे लागू किए जाएंगे? इन्हें हड़बड़ी में पारित कराने के पीछे वजह क्या है?

क्या मिला हमें ‘सुधारों’ से अब तक?

हम ओ.बी.सी. विस्तारण का स्वागत करते हैं जिसने दिल्ली वि.वि. में विद्यार्थियों की संख्या में अच्छाख़ासा इज़ाफ़ा किया। हालांकि विद्यार्थीसंख्या की बढ़त को देखते हुए अधिक शिक्षकों की नियुक्ति और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए फ़ंड दिया गया, पर शिक्षकों के 4000 नियमित पद ख़ाली हैं और बुनियादी ढांचे को विस्तृतविकसित करने में दिल्ली वि.वि. नाकाम रहा है। आज हमारी कक्षाओं और प्रयोगशालाओं में उनकी क्षमता से ज़्यादा भीड़ है, कमरों की भयंकर कमी है, प्रयोगशालाओं में साधनों का ज़बर्दस्त अभाव है और बड़ी तादाद में शिक्षक छोटी अवधिवाली नियुक्तियों के आधार पर पढ़ा रहे हैं, जिनके सामने यह साफ़ नहीं है कि अगले सेमेस्टर में वे रोज़गारशुदा रह पाएंगे या नहीं।

इन सभी मसलों में कुलपति की कोई दिलचस्पी नहीं, उनकी दिलचस्पी सिर्फ़ ‘सुधारों’ को थोपने में है। सेमेस्टर प्रणाली शिक्षकों के विरोध के बावजूद थोपी गई थी। इसने ऑनर्स पाठ्यक्रमों की गंभीरता को कम कर दिया है। गहन अध्ययन की अब वहां कोई गुंजाइ नहीं। शिक्षक और विद्यार्थी सिलेबस को पूरा करने की हड़बड़ी में गर्क़ हैं और यह चीज़ों को गहराई से समझनेसमझाने की क़ीमत पर ही हो रहा है। सिलेबस के इस दबाव ने खेल और पाठ्यक्रमेतर गतिविधियों के लिए समय ही नहीं रहने दिया है। पठनसामग्री अपर्याप्त है, ख़ास तौर से हिंदी में और नेत्रहीनों के इस्तेमालयोग्य फ़ार्मेट में। परीक्षाओं के दुगने बोझ के नीचे पूरी व्यवस्था लड़खड़ा गई है। पिछले सेमेस्टर के इम्तहानों के संचालन में अनगिनत गड़बड़ियां हुईं। ज़्यादातर पाठ्यक्रमों के परीक्षाफल अगस्त में ही निकल पाए। जनवरी 2012 में जो परीक्षाफल निकले, उनमें अंक मनमाने तरीके से बढ़ाए गए थे, ताकि यह भ्रम फैलाया जा सके कि सेमेस्टर प्रणाली अच्छा काम कर रही है। अलबत्ता, स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में विद्यार्थियों के अनुतीर्ण होने की दर बढ़ी जिसने कइयों के भविश्य को अंधकारमय बना दिया। लिहाज़ा, विद्यार्थी इस चीज़ का तर्क समझने में नाकाम हैं कि कब उन्हें अच्छे अंक मिलते हैं और कब नहीं मिलते। पुनर्मूल्यांकन के लिए फ़ीस बढ़ा दी गई है और अगले साल से पुनर्मूल्यांकन की सहूलियत ही ख़त्म हो जाएगी।

क्या यही गुणवत्ता बढ़ाने और विद्यार्थियों के लिए विकल्प बढ़ाने का तरीक़ा है? वे इस उम्मीद में दिल्ली वि.वि. आते हैं कि उन्हें अच्छी शिक्षा मिलेगी जिससे अच्छे रोज़गार का रास्ता खुलेगा। कुलपति के ‘सुधार’ शिक्षा की गुणवत्ता और विद्यार्थियों की उम्मीदों के लिए ज़बर्दस्त ख़तरा हैं। हम अपील करते हैं कि शिक्षक और विद्यार्थी इसका पुरज़ोर विरोध करें।

शुक्रवार, 24 अगस्त को विरोध रैली में भाग लें

विवेकानंद मूर्ति, कला संकाय पर दिन के12 बजे इकटठा हों 


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