नई शिक्षा नीति का विरोध करें

सार्वजनिक शिक्षा पर हमला

DU और DUTA के अस्तित्व पर हमला

राजीब रे को डूटा अध्यक्ष बनाएँ

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श्री जावड़ेकर ने साफ़-साफ़ कहा था कि “सरकार शिक्षा के क्षेत्र में एक उदारीकृत व्यवस्था लागू करने के लिए प्रयासरत है और इसमें गुणवत्ता को स्वायत्तता से जोड़ने पर बल है”। NEP (नई शिक्षा नीति) का मसौदा एक ऐसा ढाँचा पेश करता है जिसमें हर उच्च शिक्षा संस्थान (HEIs) के प्रशासकीय बोर्ड (BOG=Board of Governors) को उच्च शिक्षा के इस उदारीकृत बाज़ार में प्रतियोगिता के लिए बेलगाम छूट मिलेगी। न सिर्फ़ शिक्षकों की प्रशासन में कोई आवाज़ नहीं होगी बल्कि वे ऐसे कर्मचारी बनकर रह जाएँगे जिनका काम अपने प्रशासन द्वारा निर्देशित कार्यों को अंजाम देना होगा और उनकी तमाम सेवा-शर्तों को तय करने की शक्ति प्रशासन के ही हाथों में होगी।

अकादमिक कार्यक्रमों की पुनर्संरचना, प्रशासन को और शक्तियाँ देना तथा एक “हल्की” (उदारीकृत) नियामक व्यवस्था को लाकर विकेंद्रीकृत मुक्त बाज़ार व्यवस्था तक का परिवर्तन लाया जा रहा है। इसके लिए दिए जानेवाले ज़्यादातर तर्क यह कहते हैं कि ऐसा इसलिए क्योंकि अभी प्राइवेट खिलाड़ियों का उत्साह मंदा है और सरकारी संस्थाएँ अयोग्य हैं और क्रियान्वयन करने में अक्षम हैं।

इसके बाद सेल्फ़-फ़ायनैन्सिंग और निजीकरण का जो एजेंडा आएगा उससे सामाजिक न्याय या सभी तक शिक्षा की समान रूप से पहुँच को तगड़ा झटका लगने वाला है।इस दस्तावेज़ में दिव्यांगों और महिलाओं का ज़रा भी ज़िक्र न होना शर्मनाक है। अनुसूचित जातियों/ जनजातियों/ अन्य पिछड़े वर्गों/ शारीरिक अक्षमों के आरक्षण प्रावधानों की व्यवस्था का जहाँ ज़िक्र भी नहीं है, वहाँ निजी निवेश को और बढ़ाने पर काफ़ी बल दिया गया है जिसका सीधा अर्थ है हाशिए के इन लोगों का निष्कासन।एक अत्यधिक केंद्रीकृत राष्ट्रीय शिक्षा आयोग (RSA), जो सीधे प्रधान मंत्री के अधीन होगा, वह इन बदलावों की देखरेख करेगा और सरकारी/राजनैतिक हस्तक्षेप के लिए रास्ता भी खुला रखेगा। एक ही वार से विश्वविद्यालय की स्वायत्तता, जो सरकार और बाज़ार दोनों के दबाव से मुक्ति का नाम था, उसे सिर के बल खड़ा कर दिया गया है।

यह मसौदा जल्द ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) बनाने वाला है। कमेटियाँ इसे लागू करने के लिए सक्रिय हो गई हैं। केंद्र ने राज्यों के साथ बैठकें कर ली हैं और कई राज्यों को इसे स्वीकार करने के लिए राज़ी भी कर लिया है। जिस गति से संसद में मेडिकल कमीशन अधिनियम जैसे विनाशकारी अधिनियम पास किए जाते रहे हैं, हमें बिना कुछ देर किए सक्रिय होने के लिए जाग जाना चाहिए। NEP के इस मसौदे के ख़िलाफ़ जनमत को तैयार करने में यदि हम चूक गए तो इसका नतीजा होगा शिक्षा को बाज़ारू गतिविधि बनाने में लगे प्रशासकीय बोर्डों (BOGs) के सामने शिक्षकों की पूरी पराधीनता।

नई शिक्षा नीति के मसौदे की कुछ केंद्रीय बातें

यह मसौदा वर्तमान 40800 विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को तीन प्रकार के 15000 बृहद एकल, स्वायत्त और मल्टीडिसप्लिनरी HEIs उच्च शिक्षा संस्थानों में परिवर्तित करने का प्रस्ताव रखता है: शोध विश्वविद्यालय (टाइप 1); अध्यापन विश्वविद्यालय (टाइप 2) और डिग्री देने वाले कॉलेज (टाइप 3)। इतनी अस्तित्वमान संस्थाओं को काफ़ी कम संख्या की संस्थाओं में परिवर्तित करने के लिए विलय (merger), बंद करने (closure) और अधिग्रहण (takeover) की अपरिहार्य स्थितियों से गुज़रना होगा। सभी सार्वजनिक निधिपोषित संस्थाओं को 2020 तक प्रशासनिक बोर्ड (BOGs) गठित करने होंगे जबकि निजी संस्थानों को इसके लिए 2030 तक का समय दिया गया है। इस नीति के मसौदे (DNEP) का प्रस्ताव है कि अकादमिक पुनर्संरचना की जाएगी जिसके तहत मल्टीडिसिप्लिनारीटी, विद्यार्थियों को चयन के अधिक अवसर, FYUP जैसे अकादमिक कार्यक्रम, और शोध-कार्य का नियंत्रण नेशनल रिसर्च फ़ंड के पास होगा जो शोध के लिए निधि देनेवाला एकमात्र माध्यम बनाया जाएगा जहाँ प्रतियोगिता के आधार पर अनुदान दिए जाएँगे। सभी संस्थानों के प्रशासनिक बोर्डों (BOGs) के पास पूर्ण अकादमिक, प्रशासकीय, और आख़िरकार वित्तीय स्वायत्तता होगी।

क्या संस्थान की स्वायत्तता का मतलब संस्थान के संचालन में शिक्षक-वर्ग की स्वायत्तता है?

इसके बिलकुल विपरीत शिक्षक-वर्ग को संचालन से बिलकुल बाहर कर दिया जाएगा। सांस्थानिक स्वायत्तता सशक्त (एम्पावर्ड) प्रशासनिक बोर्ड (BOG) का रूप ग्रहण करेगी : “इसमें कार्यक्रम आरम्भ करने और चलाने की, पाठ्यचर्या का निर्धारण करने की, विद्यार्थियों की संख्या तय करने की, संसाधनों की आवश्यकता और उनके आंतरिक तंत्र को विकसित करने का निर्णय लेने की स्वतंत्रता शामिल होगी जिसमें प्रशासन और जन-प्रबंधन की व्यवस्थाएँ करना भी समाहित है। उच्च शिक्षा के संस्थान वास्तविक रूप में स्वायत्त, स्वतंत्र और स्व-प्रशासी इकाइयों के रूप में विकसित होंगे।”

प्रत्येक प्रशासनिक बोर्ड को निम्नलिखित शक्तियाँ प्राप्त होंगी: संस्थान द्वारा हासिल किए जानेवाले लक्ष्यों का निर्धारण; अकादमिक कार्यक्रमों का निर्धारण; प्रमुख कार्यपाल (Executive) को नियुक्त करना; विद्वत परिषद् जैसे निकायों का गठन व उनकी बनावट तय करना और ऐसे निकायों के सदस्यों का चुनाव करना; जनप्रबंधन तंत्र को तय करना — शिक्षकों व अन्य कर्मचारियों की अर्हताएँ, वेतन-संरचना, भर्ती के नियम और प्रक्रियाएँ, पदोन्नति की शर्तें और प्रक्रियाएँ, अनुशासनात्मक कार्रवाइयाँ जिसमें नौकरी से निकालना भी शामिल है ; अन्य सेवा सम्बंधी व कार्य-शर्तें तय करना; और शिक्षकों को डीन, विभागाध्यक्ष, प्रमुख कार्यपाल,आदि के रूप में नियुक्त करने के मनमाने अधिकार जिसमें वरीयता या अकादमिक योग्यता का आधार शामिल नहीं है। प्रशासनिक बोर्ड द्वारा सृजित निकायों की सदस्य के लिए वरीयता या क्रमावर्तन (रोटेशन) का भी प्रावधान नहीं होगा और निर्वाचित शिक्षक प्रतिनिधित्व को साफ़-साफ़ मना कर दिया गया है।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग UGC जैसी नियामक संस्थाओं पर, जो प्रतिभावानों को शिक्षण-क्षेत्र में आकर्षित करने के हिसाब से न्यूनतम वेतन और पदोन्नति की व्यवस्थाएँ करती थीं और और उन वेतन तथा पदोन्नति की योजनाओं को समय-समय पर संशोधित करती थीं, क्रमशः विराम लग जाएगा। शिक्षकों का वेतनमान विभिन्न संस्थाओं के लिए और संस्था के अंदर भी भिन्न विभागों के लिए भिन्न हो सकता है। हाँ, 5 वर्ष की परिवीक्षा (प्रोबेशन) अवधि के क़रार वाला ठेके पर नियुक्ति की व्यवस्था होनी तय है। जहां तक वर्तमान शिक्षकों का सवाल है, उनका वही वेतन सुरक्षित होगा जो इस बदलाव की तारीख पर था। उनके ‘फ्यूचर ट्राजेक्टरी’ का निर्णय प्रशासनिक बोर्ड द्वारा किया जाएगा।

प्रशासनिक बोर्डों को इतनी शक्तियां क्यों दी गई हैं?

उन्हें अपने संसाधनों को कुशल तरीके से इस्तेमाल करना है ताकि वे उन लक्ष्यों को पा सकें जो उन्होंने अपने लिए तय किए हैं!

नियामक व्यवस्था में क्या बदलाव किए जा रहे हैं?

नई नियामक व्यवस्था इस स्वायत्तता की पूरक होगी ताकि कार्य-व्यापार चल सके। “इनपुट, संसाधन, प्रक्रिया, स्थितियों आदि” के बारे में कोई नियमन नहीं होगा क्योंकि ये मामले प्रशासनिक बोर्डों के सुपुर्द कर दिए गए हैं। आधारभूत ढांचा, विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात, शिक्षकों की अर्हता, वेतनमान की संरचना, नियुक्ति और पदोन्नति के नियम व प्रक्रियाओं के संबंध में कोई विवरण नहीं दिए जाएंगे। नियामक उन लक्ष्यों के बारे में कोई विशेषताएँ निर्धारित नहीं करेंगे, जो संस्थान अपने लिए तय करेंगे। वे सिर्फ ‘गुड गवर्नेंस’ का ढांचा तय करेंगे, वित्तीय क्षमता और स्थिरता की माँग करेंगे, और यह सुनिश्चित करेंगे कि प्रशासनिक बोर्ड कुछ शैक्षणिक परिणामों को भी अपने लक्ष्यों के अंतर्गत लाएँ और इन लक्ष्यों की सार्वजनिक घोषणा करें। संस्थानों (प्रशासनिक बोर्डों) पर केवल ये ही बंदिशें होंगी- क) सभी सूचनाओं को सार्वजनिक करना और ख) कुछ खास लक्ष्यों के मूल्यांकनों का प्रत्यायन (Accreditation) और सूचनाओं के सार्वजनिक प्रकटीकरण का अनुपालन।

फ़ंडिंग के बारे में क्या है?

सार्वजनिक निधि पोषित (सरकारी) संस्थानों को अपनी विकास- योजना तैयार करके फ़ंडिंग एजेंसी के पास जाना होगा। फ़ंडिंग एजेंसी दिए जानेवाले फ़ंड की मात्रा इस योजना और संस्थान के प्रदर्शन आकलन के आधार पर तय करेगी। पूरी फ़ंडिंग की जगह “पर्याप्त” फ़ाइंडिंग का वादा किया गया है। हर संस्थान को विकास-कार्यालय का गठन करना होगा ताकि और संसाधन/राशि का जुगाड़ किया जा सके।

अगर सहबद्धता (Affiliation) की व्यवस्था ख़त्म कर दी गई तो दिल्ली विवि का संघीय ढाँचा बचा रहेगा?

शिक्षा नीति का मसौदा (DNEP) कहता है कि ख़राब गुणवत्ता के लिए सहबद्ध (Affiliated) कॉलेज और ज़्यादातर अस्तित्वमान संस्थाओं का लघु आकार ही ज़िम्मेदार है और सहबद्धता की व्यवस्था को हटाने का प्रस्ताव देता है।

एनडीटीएफ चाहता है कि हम यह विश्वास कर लें कि हमारे कॉलेज दिल्ली विवि के साथ सहबद्ध कॉलेजों के रूप में बने रहेंगे! DNEP एक कॉलेज को सहबद्ध कॉलेज के तौर पर तभी मान्यता देने की बात करता है जब उनका अपनी पितर-संस्था में पूरी तरह विलय हो जाए। इसलिए जो कॉलेज विवि के प्रशासनिक बोर्ड (BOG) से पूरी तरह शासित नहीं होगा वह एक स्वायत्त कॉलेज होगा।

वर्तमान प्रशासकीय ढाँचे को नए ढाँचे में बदलने के लिए क़ानून में बदलाव की ज़रूरत है। जब सभी संस्थाओं का समान प्रशासकीय ढाँचा हो जाएगा तो विभिन्न विश्वविद्यालयों के एक्ट को बदलने की ज़रूरत ख़त्म हो जाएगी। अभी सिर्फ़ इतना करना है कि सभी अस्तित्वमान एक्ट निरस्त करके कोई समान एक्ट पास कर दिया जाए।

क्या तब जिस DUTA को हम जानते हैं, बची रहेगी?

जिस तरह का प्रस्ताव DNEP में है, यदि उस तरह से हमने दिल्ली विवि के टुकड़े होने दिए, तो DUTA का जारी रहना संकट में पड़ सकता है क्योंकि शिक्षक विभिन्न स्वायत्त संस्थानों के अलग-अलग प्रशासनिक बोर्डों के रहमोकरम पर आ जाएँगे। शिक्षा के क्षेत्र में बाज़ारवादी नीतियों की यह चाह रही है कि दबंग प्रशासन और सरकार की नीतियों को चुनौती देनेवाले शिक्षक संघों से छुटकारा पाया जाए।

NDTF राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मसौदे (DNEP) पर चर्चा करने से ही काफ़ी डरता है, उस पर आलोचनात्मक राय बनाकर शिक्षकों और शिक्षा के क्षेत्र में आनेवाली आपदा के बारे में ध्यान दिलाने के ज़रूरी कार्य में शामिल होना तो दूर की बात है। DUTA ने जो कमेटी DNEP की जाँच करके फ़ीडबैक के लिए उसका क्रिटीक तैयार करने के लिए बनाई थी, उससे NDTF अलग रहा। उसने DNEP के निहित उदारवादी ढाँचे से ध्यान भटकाने की कोशिश भी की। जब भी इस बारे में उससे पूछा गया है, NDTF ने ज़्यादातर चुप्पी साध ली है या यह कहकर टालने की कोशिश की है कि यह दस्तावेज़ महज़ एक अकादमिक कसरत है।

सरकार के सामने झुक जाने से हमें काफ़ी नुक़सान उठाना पड़ेगा। हम एक नाज़ुक मोड़ पर खड़े हैं। DUTA के सामने विद्यार्थियों, दूसरे विश्वविद्यालयों के शिक्षकों और ऐसे हर इंसान के पास पहुँचने का दायित्व है जो सार्वजनिक शिक्षा के पक्ष में खड़ा होना चाहता है। यही एकमात्र राह है जिसपर चलकर हमने कार्य-भार बढ़ाकर शिक्षकों की संख्या घटाने के प्रयासों को और 70:30 के फ़ार्मुला को, जिसने वेतन-संशोधन को निजी संसाधन पैदा करने की शर्त के साथ नत्थी कर दिया था, दिल्ली विवि के कॉलेजों को स्वायत्त बनाने की कोशिशों को, API की स्कीम पर आग्रह बनाए रखने को, और आरक्षण रोस्टर के साथ छेड़छाड़ को नाकाम किया था।

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