राजीब रे को डूटा अध्यक्ष बनाएँ

शिक्षा में सार्वजनिक निधि के इस्तेमाल और सामाजिक न्याय की मज़बूती के लिए किए जाने वाले संघर्षों में हमेशा आगे रहनेवाले शिक्षक संगठन डेमोक्रेटिक टीचर्स फ़्रंट (डीटीएफ) ने इस बार डूटा (DUTA) के अध्यक्ष पद के लिए फिर से वर्तमान डूटा और फ़ेडकूटा (FEDCUTA) के अध्यक्ष राजीब रे को खड़ा किया है। डीटीएफ ने डूटा कार्यकारिणी के लिए भी युवा जोश और अनुभव दोनों गुणों से संपन्न चार प्रतिबद्ध लोगों को खड़ा किया है।

डूटा अध्यक्ष के रूप में राजीब रे ने विश्वविद्यालय और कॉलेजों को बाज़ार की ओर धकेलनेवाली सरकारी चालों के ख़िलाफ़ कई सफल संघर्षों का नेतृत्व किया है। उन चालों में पे रिवीज़न के लिए 70:30 की फ़ंडिंग के फ़ॉर्मूले के तहत उन्हें व्यावसायिक गतिविधियों से 30% ख़र्चा जुगाड़ने के लिए बाध्य करना हो, या ऑटोनोमस कॉलेज स्कीम के ज़रिए दिल्ली विश्वविद्यालय के नामचीन घटक कॉलेजों को व्यावसायिक दुकानों में तब्दील करना ताकि उनका सबसे मुख्य काम अपने लिए फंड जुटाना हो जाए, शामिल है। उनके नेतृत्व में डूटा ने कॉलेजों/विश्वविद्यालयों में 200 प्वाइंट वाले रिजर्वेशन रोस्टर (जिसकी जगह एक गैरवाजिब व्यवस्था लागू की जा रही थी) को पुनः बहाल करने के देशव्यापी अभियान एवं संघर्ष की अनवरत और सफल अगुवाई भी की है। रिजर्वेशन रोस्टर के कारण उत्पन्न गतिरोध के टूटने से स्थायी नियुक्तियों के चालू होने की संभावना फिर से बनी है।

उनके नेतृत्व में चले अवकाशप्राप्त शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों की आजीविका (पेंशन) पर सरकार द्वारा किए गए शर्मनाक हमले के खिलाफ़ डूटा के लंबे संघर्ष से विकल्प श्रेणी वाले भुक्तभोगियों को राहत मिली है।

पदोन्नति/प्रोमोशन संबंधी कई अतार्किक और अनुचित प्रावधानों को बदलने में डूटा सफल रही है, बाकियों के लिए भी राहत के उपाय तलाशने में जुटी है, क्योंकि यह संवेनहीन विश्वविद्यालय प्रशासन प्रोमोशन लागू होने की प्रभावी तारीखों को मनमाने तरीके से बदलकर प्रोमोशन की प्रक्रिया में जान बूझकर विलम्ब पैदा कर रहा है।

उनके सक्रिय नेतृत्व में डूटा ने पिछले दो साल की बेहद विपरीत स्थितियों में भी तदर्थ शिक्षकों की पुनर्नियुक्ति सुनिश्चित की हैपिछले बरस 13 प्वाइंट रोस्टर की लटकती तलवार के सामने और इस बरस सरकार द्वारा शिक्षकों के पदों में EWS श्रेणी के आरक्षण को लागू किए जाने के संकट में।

सरकार द्वारा उच्च शिक्षा के खर्च में की गई भारी कटौती की पृष्ठभूमि में इस बार डूटा चुनाव हो रहा है। विश्वविद्यालयों को कर्ज़े लेने और ऐसे मेमोरेन्डमों पर दस्तख़त करने के लिए बाध्य किया जा रहा है जो उन्हें फीस बढ़ाने तथा सेल्फ़फायनांसिंग कोर्सों के जरिए बाज़ारीकरण को बढ़ावा देने पर मजबूर करते हैं। नई शिक्षा नीति इस तरह से रची गई है जो राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ाए, सारे उच्च शिक्षा संस्थानों का बाज़ारीकरण करे, फैसले लेने की प्रक्रिया को प्रधान मंत्री और उसके मंत्रिमंडल के प्राधिकार में केन्द्रीकृत कर दे और विश्वविद्यालयों के प्रशासन को व्यवसायीकृत कर दे। यह एक ऐसी संरचना ला रहा है जिसमें शिक्षकों का वेतन और उनकी सेवाशर्तें पूरी तरह प्रशासनप्रबंधन के हाथों में आ जाएगी और एक ओर व्यावसायिक उत्पादकता तो दूसरी ओर प्रशासनप्रबंधन के आगे समर्पण से संचालित होगी।

विद्यार्थियों की भर्ती में EWS विस्तार के कारण आवश्यक 25% बढ़ोत्तरी के लिए आवंटित निधि/फंड एकदम अपर्याप्त है। जबकि पहले से परिदृश्य में स्थायी शैक्षिक और गैरशैक्षिक पदों की लगातार बढती रिक्तियाँ, प्रोमोशन की अनुपस्थिति और पेंशन का भुगतान नहीं किया जाना शामिल है।

डीटीएफ इन शिक्षाविरोधी और शिक्षकविरोधी नीतियों के खिलाफ़ संघर्षों को तेज़ करने के लिए आपका जनादेश चाहता है। लोगों का जनवादी संघर्ष ही ऐसी नीतियों और प्रशासनिक दुराचारों से पैदा हुई चुनौतियों से लड़ने का एकमात्र तरीका है। शिक्षा की उत्कृष्टता और उसके समान अवसर दोनों के लिए बढ़ता निजीकरण और बाज़ारीकरण विपर्यय है।

शिक्षकों की सेवाशर्तों के मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन उदासीन और प्रतिकूल बना हुआ है। इसने एबीवीपी को उस भवन में, जहाँ विद्वत परिषद में पाठ्यक्रमों पर बहस चल रही थी और बाद में कई विभागों में घुसने देकर लोकतांत्रिक अधिकार और शैक्षणिक स्वायत्तता पर हमला करने की छूट दे दी है। ये किताबों को प्रतिबंधित करना, पाट्यक्रमों को खोखला करना और शासक दल की विचारधारा से अलग मत रखनेवाले शिक्षकों को निशाने पर लेना चाहते हैं।

डीटीएफ अकादमिक स्वतंत्रता की सुरक्षा और शिक्षक समुदाय की एकता के लिए प्रतिबद्ध है। वह समायोजीकरण के लिए किए जानेवाले संघर्षों को तैयार करने, सही आरक्षण, उचित सेवाशर्तों, सभी श्रेणी के शिक्षकों को बकाया पेंशन के भुगतान और हरेक शिक्षक के कैरियर में समयबद्ध पदोन्नति के लिए जुटा हुआ है।

डीटीएफ आपसे अपील करता है कि डी.टी.एफ. पैनल को अपना बहुमूल्य मत देकर विजयी बनायें।

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