‘टेकबे त टेक, न तो गो’

एक सिद्धांतवादी मौक़ापरस्त से कुलपति को चिटठी


Tek

महामहिम कुलपति महोदय,

इतना फ़ैसलाकुन वक़्त सामने है कि आपको चिटठी लिखना निहायत ज़रूरी हो गया है। नाचीज़ को बहुत षिददत से यह महसूस हो रहा है कि डूटा के इस चुनाव में मामला ‘मत चूको चौहान वाला है। ‘चौहान पर चौंकने की ज़रूरत नहीं। वह तो ज़माना ही चौहानों का था, कवि बेचारा क्या करता! सो चौहान को मारिए गोली, जो असल बात है, उसे समझिए। असल बात यह कि डूटा नामक इस ‘ग़ैरक़ानूनी कल्याण संघ का सत यानी सारतत्व खींच लेने का यह नायाब मौक़ा है। अच्छा तो होता कि इसका वजूद ही मिटा दिया जाता, इसके दफ़्तर पर ताला लगवा दिया जाता और इसके अध्यक्ष की मेज-कुर्सी को किसी म्यूजि़यम में रखवा दिया जाता, जहां आगामी वर्शों में इतवार-के-इतवार कोर्इ-न-कोर्इ कान्ट्रैक्ट टीचर दोपहर की पिकनिक के लिए रोटी-अचार की पोटली बांधे अपने बच्चों के साथ पहुंचता और षीषे के ख़ाने में बंद डूटा को देख कर आहें भरता कि हाय, तुम होतीं तो ऐसा होता, तुम होतीं तो वैसा होता। फिर जब खाने के समय उसके बच्चे पूछते कि हे मेरे कान्ट्रैक्ट पापा, वो कौन थी जिसके लिए आप आहें भर रहे थे, तो वह रुआंसा कान्ट्रैक्ट टीचर रोटी के निवाले पानी की मदद से हलक में उतारते हुए जवाब देता, ‘तुम नहीं समझोगो बच्चो, इस देष में कभी यूनियनें हुआ करती थीं…।

पर डूटा की यह गत बनाना षायद ऊपर वाले को अभी मंजूर नहीं। तभी तो चुनाव-वुनाव की तैयारियां चल रही हैं! ऐसे में सबसे अच्छा विकल्प क्या होगा? यही कि हमने जिस दफ़्तर की चर्चा की, उसे सत्ता के दलालों का अडडा बना दिया जाए, और जिस मेज़-कुर्सी को म्यूजि़यम के लायक बताया, उस पर सबसे छंटे हुए दलाल को ससम्मान बिठा दिया जाए। यह काम आप ही कर सकते हैं, महामहिम, क्योंकि आप ही हैं जिसे किसी भी और कुलपति के मुक़ाबले षिक्षक-प्रतिनिधियों की ख़रीद-फ़रोख़्त में सबसे अधिक क़ामयाबी मिली है। किसी और कुलपति ने डूटा का इतना निरादर किया होता तो ये षिक्षक-प्रतिनिधि कुलपति-कार्यालय की र्इंट-से-र्इंट बजा कर रख देते, पर आपने पता नहीं कैसे निवाले फेंके कि उनमें से ज़्यादातर ने दूर से ही तमाषा देखते रहना पसंद किया! किसी और कुलपति ने षिक्षा का स्तर चौपट करनेवाली, दलितों और कमज़ोर वर्गों के षिक्षार्थियों को बाहर का रास्ता दिखानेवाली और नौकरियों पर कान्ट्रैक्चुअलाइज़ेषन का संकट खड़ा करनेवाली एफ़.वार्इ.यू.पी. जैसी योजना सामने रखी होती तो प्रतिनिधियों ने ए.सी. और र्इ.सी. की बैठक में हंगामा बरपा कर दिया होता, पर आपने पता नहीं अंदरख़ाने कौन-से सब्ज़बाग़ दिखाए कि डी.टी.एफ़. और दो-एक अन्य वाम-प्रतिनिधियों को छोड़ कर सदन के अंदर किसी ने भी अपनी असहमति दर्ज नहीं की, न ही बहस-मुबाहिसे की मांग रखी। डूटा की कार्यकारिणी में भी इन लोगों ने एफ़.वार्इ.यू.पी. पर कोर्इ बहस नहीं चलने दी। और तो और, 300 षिक्षकों के ‘रिकिवजि़षन लेटर को दरकिनार करते हुए, अध्यक्ष अमरदेव षर्मा को आम सभा बुलाने से रोकने में इन्होंने एड़ी चोटी का ज़ोर लगा दिया।

सुनते हैं, ‘टेक ऐडवांटेज आपका तकि़याक़लाम है, जिसे उस दिन फ़ाउंडेषन कोर्स वाले जलसे में भी आप बार-बार दुहरा रहे थे। यह तकि़याक़लाम बनाए रखें, महामहिम। ऐडवांटेज टेकने का ही ज़माना है और हिंदी की एक कथाकार ने तो जुमला भी तैयार कर दिया है, ‘टेकबे तक टेक, न त गो। सुना, अंदरख़ाने हुर्इ सौदेबाजि़यों में ज़्यादातर षिक्षक-प्रतिनिधियों ने ‘गो वाले विकल्प की तरफ़ देखा तक नहीं, बस टेकते गए। ऐडवांटेज को अंग्रेज़ी में टेका और घुटनों को हिंदी में। कमाल है, मान्यवर! ऐसा जलवा तो आज तक कोर्इ कुलपति नहीं दिखा पाया था। बात यह है कि स्वामिभकित का पुरस्कार जितने निस्संकोच भाव से देने की कुव्वत आपमें है, वैसी आज तक किसी कुलपति में नहीं पार्इ गर्इ। अभी-अभी पता चला कि एक स्वामिभक्त को पैं-सठियाने के बाद भी उपकुलपति की कुर्सी पर बिठाए रखने के लिए आपने सारे नियम-क़ानून की धजिजयां उड़ाते हुए एक प्रस्ताव र्इ.सी. में पारित करा लिया। कौन मार्इ का लाल ऐसा कर सकता था!

इसीलिए मुझे पूरा विष्वास है कि आप ही कुछ ऐसा मंतर फेर सकते हैं जिससे डूटा की कमान दलालों के हाथ में चली जाए और अभी तक की उसकी आतंकवादी और हुड़दंगी परंपरा, जिसे ये डी.टी.एफ़. वाले जनवादी और जुझारू परंपरा कहते हैं, उसका अंतिम संस्कार हो जाए।

मामला सिफऱ् यह नहीं है कि ऐसा आपके हाथों होना मुमकिन है, मामला यह भी है कि ऐसा होना ज़रूरी है। मुमकिन तो बहुत सारी चीज़ें होती हैं, पर ज़रूरी नहीं होतीं। मिसाल के लिए, विष्वविधालय के भविश्य का नक्षा बनाते हुए दलित और कमज़ोर वर्गों के हितों को प्राथमिकता देना मुमकिन है, पर उसकी ज़रूरत क्या है! मिसाल के लिए, तदर्थ षिक्षकों की जितनी बड़ी फ़ौज तैयार हो गर्इ है, उसे अविलंब नियमित किया जाना मुमकिन है, पर ज़रूरत क्या है! कहने का मतलब यह कि हर मुमकिन चीज़ ज़रूरी नहीं होती… पर डूटा का सत खींच कर उसे अंदर से खोखला करना मुमकिन ही नहीं, ज़रूरी भी है। देखिए, कितने सालों से इस जुझारू जमात ने आप जैसे हाकिमोें की नाक में दम कर रखा है (जी, नाक ही कह रहा हूं, कुछ और न सुन लीजिएगा)! और अपनी इस करतूत को ये हिंदी में संघर्श और अंग्रेज़ी में स्ट्रगल कहते हैं। हालांकि हाकिमों की नाक में दम करने से जो सहूलियतें षिक्षक-समुदाय को हासिल हुर्इं, उनके लाभार्थी आप भी हैं, पर अब जबकि आप हाकिम वाली श्रेणी में आ गए हैं तो अपनी और अपनी पूरी श्रेणी की नाक के बारे में सोचना आपका पहला कर्तव्य है। अगर ये डूटा वाले लड़-भिड़ कर षिक्षक और षिक्षा के हितों की बातें मनवाते रहेंगे तो इतने परिश्रम से हाकिम की श्रेणी में जगह पाने का फ़ायदा ही क्या रह जाएगा? आखि़र इतनी मुषिकल से आदमी ऊपर चढ़ता है। ऊपर चढ़ने के बाद उसे पता चले कि अधिकारी और मातहत के बीच कोर्इ फ़कऱ् ही नहीं रह गया है तो दुनिया कितनी निस्सार लगने लगेगी!

यह तो हुर्इ एक बात जिसका परिप्रेक्ष्य थोड़ा बड़ा है। अब दूसरी और एकदम फ़ौरी ज़रूरत से जुड़ी बात। जिन हुड़दंगियों ने एफ़.वार्इ.यू.पी. के खि़लाफ़ अकादमिक जगत में इतना बड़ा जनमत तैयार करवा डाला, ‘सेव डीयू कैंपेन चलाकर इस योजना की रोज़-रोज़ लानत-मलामत की, विधार्थियों को भी विरोध की मुहिम से जोड़ लिया, उनकी बातों के साथ सहमति रखनेवालों की तादाद इधर बढ़ी है। लोगों का कहना है कि फाउंडेषन कोर्सेज़ की पढ़ार्इ षुरू होते ही इस दरिद्र योजना की पोलपटटी खुलने लगी है। विधार्थियों से लेकर षिक्षकों तक, हर जुबान पर इसकी बौद्धिक कंगाली का ही चर्चा है। षिक्षक एक-दूसरे से मिलते ही हालचाल के नाम पर मुस्कुरा कर पूछते हैं, ‘और? एफ़.सी. पढ़ा रहेे हो या नहीं? गोया एफ़.सी. न हुआ, ग़रीब की जोरू हो गर्इ। ऐसे माहौल में अगर इस मुर्इ डूटा को अंदर से खोखला न किया गया तो वह आपके सपने पर भारी पड़ सकती है।

और आपके सपने में सिफऱ् एफ़.वार्इ.यू.पी. ही तो नहीं है! अभी-अभी आपने र्इ.सी. में ‘नाक को पारित कराया है। यानी अब एक बाहरी एजेंसी हमारे कालेजों का आकलन करके उसकी ग्रेडिंग करेगी। अगर जुझारू नेतृत्व की बन आर्इ तो ‘नाक के सवाल पर कहीं आपको नाकों चने न चबाना पड़े! फिर तदर्थ षिक्षक, जिनकी तादाद आज कुल षिक्षकों का पचास फ़ीसदी हो गर्इ है, उनका धैर्य भी जवाब दे रहा है। डूटा का अपना मिज़ाज क़ायम रहा तो ख़तरा है कि वह इस असंतोश को उसी लड़ाके अंदाज़ में संबोधित करने लगेगी। यानी कुल मिलाकर हालात ऐसे हैं कि षिक्षकों के इस सामूहिक निकाय पर अगर जनप्रतिनिधियों का मुखौटा लगाए दलालों का क़ब्ज़ा सुनिषिचत न किया जाए तो षांति से राजकाज चलाना दूभर हो जाएगा।

संतोश की बात यही है कि कुछ षिक्षक-समूह अब सांठगांठ की प्रवृतित का आदर्षीकरण करने लगे हैं, उसे सिद्धांत और उसूल का दर्जा देने लगे हैं। उनका कहना है कि नेतृत्व ऐसा होना चाहिए जो सत्ता के साथ मिल कर उसकी योजनाओं में कुछ चोर दरवाज़े निकलवा सके जिससे षिक्षकों को थोड़ा सुकून मिल जाए, और मौजूदा नेतृत्व से उनकी षिकायत है कि उसने ऐसा नहीं किया। वे जब कहते हैं कि दो सालों में डूटा नेतृत्व ने कुछ नहीं किया तो उनका आषय यही होता है। मान्यवर, इसमें कोर्इ षक नहीं कि यही सांठगांठवादी लोग हमारे अपने लोग हैं। यही हैं जो षिक्षक आंदोलन को बुनियादी मुददों से भटका कर छोटी-मोटी सुविधाएं हड़पने के व्यकितगत ओछेपन के स्तर तक गिरा सकते हैं और एक जुझारू डूटा को इतिहास और संग्रहालय की चीज़ बना सकते हैं। इनके चुनाव-अभियान में आपने व्यकितगत रूप से जो दिलचस्पी दिखार्इ है, वह बहुत ज़रूरी थी। सुना है, फाउंडेषन कोर्सेज़ के लेकर आपके द्वारा किया गया भव्य आयोजन इसी अभियान का हिस्सा था, जिसमें आपने साबित करने की कोषिष की कि आपसे सांठगांठ रख कर काम करनेवाला नेतृत्व सबके लिए फ़ायदेमंद होगा। पर साथ में यह भी सुना है, महोदय, कि वह आयोजन ज़्यादातर भागीदारों को ख़ासा हास्यास्पद लगा और अख़बारों ने तो उसे नौटंकी बताते हुए पूरे-पूरे पन्ने रंग दिए।

ख़ैर, कोर्इ बात नहीं। अपना मनोबल टूटने नहीं देना चाहिए। इसके लिए ज़रूरी है कि हम अपने को बार-बार याद दिलाते रहें कि इस निगोड़ी डूटा ने विष्वविधालय के प्रषासकों से लेकर देष के षासकों तक को कितना सताया है। बार-बार याद दिलाते रहें कि इसके नेतृत्व को नंदिता नारायण के हाथों में जाने देने से रोकना अभी का सबसे बड़ा ऐतिहासिक कार्यभार है। सुनते हैं, यह गणितज्ञ और पुरानी र्इ.सी. मेम्बर अगर अध्यक्ष वाली कुर्सी पर बैठ गर्इ तो आपके लिए आगे के दो साल बहुत मुषिकल होेनेवाले हैं।
रोकिए, महामहिम, रोकिए! वर्ना डूटा जीवित रह जाएगी। उसका जीवित रहना आप जैसे षेर और मुझ जैसे लकड़बग्घे के लिए सबसे बड़ा सदमा होगा! जब आपका ही पेट भरने पर आफ़त आ जाएगी तब जूठन की आस में बैठे हम जैसों का क्या हाल होगा?

प्रार्थी,
एक सिद्धांतवादी मौक़ापरस्त

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